आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ

Poetry

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हा नहीं जलाए या बस्ती ही जल गई
कुच्छ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों से पोंछने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमान ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ

-गुलज़ार