shayarisms4lovers June18 199 - दिन कुछ ऐसे गुज़रता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुज़रता है कोई

Poetry

दिन कुछ ऐसे गुज़रता है कोई
जैसे एहसान उतरता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उच्छालता है कोई

फिर नज़र में लहू के छिन्टे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूंजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई

-गुलज़ार