shayarisms4lovers June18 199 - God stories in hindi to restore faith भगवान की कहानी

God stories in hindi to restore faith भगवान की कहानी

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God stories in hindi – Bhagwan ki kahani

एक गांव में एक ब्राहम्ण परिवार रहता था. उस ब्राहम्ण परिवार में तिन भाई थे और खेती-बाड़ी का काम करते थे. तीनो भाइयो में नित्यानंद जी सबसे बड़े भाई थे. वह सुबह-सुबह उठते और गंगा स्नान करने जाते फिर आकर भगवान का भजन और पूजन में लग जाते. उनका ये दिनचर्या हर मौसम में चलता रहता.

न बरसात उनका रास्ता रोक पाई, न ही कड़ाके की ठण्ड और न भीषण गर्मी. हर मौसम में सुबह 4 बजे उठते और अपना कमंडल लेकर निकल पड़ते नंगे पैर. न ही पत्थर चुभने का गम, न ही विषैले जीवो का डर. उनको न तो बिजली की कड़कहट डरा पाई और न अंधरी रात की आंधी-पानी.

उनके इस आदत से उनके घर वाले परेशान रहते थे. भाईओं के कहने पर भी न तो खेत में जाते और न ही घर का कोई काम करते जबकि दोनों भाई मेहनत से काम करते. उनके इस आदत से उनकी धर्मपत्नी भी उनके ऊपर गुस्सा करती रहती. “दुनिया कमा कर क्या से क्या कर रही है मगर इनको अपने पूजा-पाठ से समय नही मिलता है.

दिनभर राम-राम जपने से खाना नहीं मिल जाता. उसके लिए काम करना पड़ता है. ऐसे कब तक चलेगा कब तक भाइयों के किये काम पर बैठ कर खाओगे. कम-से-कम दिन भर में एक बार खेतो से घूम ही आओ. दिन भर भगवान कहने से कुछ नहीं होगा.”

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इन सब बातो पर नित्यानंद जो मुस्करा देते और बोलते-“तुमको लग रहा है की मेरे भाई मुझे खिला रहे है. नहीं! ये तो परमेश्वर ही है जो मुझे लाकर देता है. सब उनकी मर्जी से होता है. सभी को खाना भी वही देते है. भाई तो माध्यम मात्र है.”

उनकी ये बात न तो उनकी पत्नी को समझ में आती और न ही उनके भाईओं को. हालत दिन-पर-दिन बिगड़ते गए. न ही पंडित जी ने अपना नित्यकर्म छोड़ा और न ही भगवान का कीर्तन भजन. उनके इस व्यवहार से उनके भाईओं ने और उनकी पत्नी ने उनको सबक सिखने को सोच.

अगले दिन

अहिसे ही गंगा से स्नान करके लौटे भाईओं ने बोला-‘ भैया आप कुछ करते नहीं है. केवल हम ही करते है. अप बैठे –बैठे केवल खाते है. इसलिए सभी ने सोचा है हमलोग बटवारा कर ले. आप अपना बना कर खाइए और हम दोनों भाई अपना.”

उनकी बात सुनकर नित्यानंद जी मुस्करयें –‘अच्छा तो अब भगवान मेरी परीक्षा लेने वाले है. तो मैं भी कहा फेल होने वाला.” उन्होंने हँसते हुए कहा – “तुम लोग को जो चाहिए वो ले लो और जो मेरा हिस्सा है मुझे दे दो.”

“देखती हूँ अब कहा से खाते है. और आपका भगवान क्या करते है. मैं भी आपके भाईओं के साथ हूँ. आप अकेले बनाओ और खाओ.” उनकी पत्नी भी उन्हें सबक सिखाने के लिए उनके तरफ न होकर भाइयों के तरफ आ गई. मगर इन सबसे पंडितजी को क्या? जो भगवान के तरफ ही है उसको किसी का क्या जरूरत पड़ेगा. जो भगवान् के शरण में चला गया. उसे कही और जाने की क्या जरुरत.

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ऐसे ही तिन दिन बित गया. पंडितजी की दिनचर्या नही बदली. रोज सुबह ऐसे ही उठते और गंगा स्नान जाते फिर पूजा-पाठ में लग जाते. भूख लगने पर लाये हुए गंगा जल पी लेते. दिन बीतने की साथ ही घरवाले यही देखने में रहते की अब क्या करते है. कितने दिन रहते है ऐसे. अब तो कुछ काम करना ही पड़ेगा. आज तो खाना बनाना ही पड़ेगा.

“घर में कुछ खाने को तो है नहीं कुछ कर क्यों नहीं लेते.” रात में उनकी पत्नी ने कहा.

“ये जो मुँह है किसी लकड़ी से नहीं चिरा गया है. जिसने इसे बनाया है वो खाना भी देगा. जो इस पुरे संसार को चला रहा है जो छोटे-छोटे चीटी से लेकर बड़े-से बड़े विशालकाय जीव को खाना दे रहा है. वह मुझे भी देगा.”

“तो उसके लिए कर्म भी करना जरुरी है न, केवल बैठे-बैठे रहने से खाना मिल जाएगा.” परेशान धर्मपत्नी ने पूछा.

“मैं अपना कर्म तो कर ही रहा हूँ. सुबह उठ कर गंगा स्नान करने जाना फिर भगवान का पूजा पाठ करना. ये ही तो हमारा कर्म है.” उन्होंने पत्नी को समझाते हुए कहा- “पैसा तो जितना चाहूँ कमा लूँ. लेकिन उस पैसे का होगा क्या. पैसा आने से कल से ही तुम्हारे और तुम्हारे बच्चो का लड़ाई शुरू हो जाएगा. अगर कुछ भगवान् से मांगना ही है तो सहनशक्ति मांगों. क्यों की इंसान को थोड़ा सा कुछ मिलने पर आपा खोने लगता है. उसे न ही धर्म का ख्याल रहता है और न अधर्म की.”

मगर ये सब बाते उनकी धर्मपत्नी को कहा समझ में आनी थी सांसारिक जीवन में फसे जुए मनुष्य को बड़ा ही बेकार लगता है ये बाते. वो उठी और मुहँ बनाते हुए वहाँ से चली गई.

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पंडित जी रोज की तरह आज भी गंगा स्नान करने गए थे. घर में भाई भी अपने काम पर गए थे. उनकी पत्नी अकेली थी. उसी वक्त सुनहली, चमचमाती थाली लिए उनके घर कोई आया.

“पंडितजी घर पर है क्या?” उस आदमी ने उनकी धर्म पत्नी से पूछा.

“नहीं, वो तो गंगा जी गए है, कुछ देर बाद आयेंगे. आप कौन है?” उनकी पत्नी ने पूछा.

“जी मैं उनका शिष्य हूँ. ये कुछ थाली है पंडितजी को दे दीजिएगा” उन्होंने थाली देते हुए कहा.

“मगर उन्होंने किसी को अपना शिष्य बनाया ही नहीं है.” उनकी पत्नी ने बोला.

“हाँ, मैं ही एक उनका शिष्य हूँ. अच्छा चलता हूँ.” जाते हुए उस आदमी ने कहा.

“मगर नाम तो बताइए. पंडितजी आयेंगे तो क्या कहेंगे.”

“जी उनसे कहियेगा की जिसको बोल रहे थे की ये लकड़ी से नहीं चिरा गया है. जिसने बनाया है वो खाना भी देगा.”

जबतक वो समझ पाती वो आदमी वहाँ से जा चूका था. वो पंडितजी के आने का इंतजार करने लगी.

“आपने शिष्य भी बना रखा है मुझे तो कभी बताया ही नहीं.” पंडितजी के आते ही उनकी पत्नी ने पूछा.

“नहीं मैंने तो कोई शिष्य नहीं बनाया है.” पंडितजी जी ने कहा.

Ek kahani bhagwaan ki

“तो वो कौन था जिसने आज सुबह-सुबह भोजन और सोने-चाँदी से भरा थाली दे गया. वो तो बोल रहा था की मैं उनका शिष्य हूँ.” जो-जो बात था बताते हुए बोली. पंडितजी को आश्चयर्य हुआ. कौन है वो ? “नाम क्या बताया उसने?” पंडितजी ने आश्चयर्य चकित होकर पूछा.

“वो बोल गए की पंडितजी से बोल दिजिएगा की जिसको बोल रहे थे जिसने मुहँ बनाया है वही खाना भी देगा. वही हूँ.”

इतना बात सुनते ही पंडितजी के आखो से आंसू निकल पड़ा. ”भगवान आप की भी लीला महान है. जिसने आपको माना नहीं उस पर ही दया दिखा दिया.”

“जानती हो कौन थे– “वो साक्षात् भगवान् थे. तुम कितनी भाग्यशाली हो जो उनका दर्शन किया. मैं नीच, पापी मुझे क्यों नहीं दर्शन दिया प्रभु.?’ कहकर रोने लगे.

भगवान् भी उसी तरह अधूरे है भक्त के बिना, जिस तरह एक भक्त भगवान् के बिना अधूरे है.