shayarisms4lovers June18 272 - Hindi Stories | घरु

Hindi Stories | घरु

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घरु | Hindi Stories

परितोष तेजवानी घर में आते ही सबसे पहले अपने पिता जगमोहन तेजवानी के पास आया| जगमोहन  तेजवानी 83 वर्ष के विधुर वृद्ध थे| सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त, परितोष भी प्रोढ़ अवस्था में आ चूका था और एक नामचीन पत्रकार है|

{जगमोहन  अपने कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठे नित्य की भांति अपने ही विचारों में लीन है| धीमी आवाज़ में मल्लिका पुखराज के गाने चल रहे हैं}

परितोष ने अपने पिता के हाथो को अपने हाथों से नरमी के साथ पकड़ा और बोला “पापा जी”| जगमोहन का ध्यान भंग हुआ और पुत्र को देखकर एक हलकी सी मुस्कराहट अपने चहरे पर बिखेर दी| चेहरे की झुर्रियों में भी जगमोहन आँखे उनकी मुस्कान की गवाही दे रही थी|

परीतोश की आँखों में चमक थी उसने उत्साह से कहा “पापा तयारू कर लो, हम घरु जायेंगे”(पापा तैयारी कर लो हम घर जायेंगे)

जगमोहन एकदम से चंचल हो उठा और बोला “क्या जामपुर?”

परितोष ने जोर देकर कहा “हाँ, टहु दिहुं बाद” (हाँ तिन दिन बाद)

जगमोहन ने संक्षिप्त उत्तर दिया “ठिकू” (अच्छा है) और अपनी कुर्सी से सर टिका कर आँख बंद कर ली|

परितोष कुछ देर और अन्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में बैठा रहा फिर उठकर बाहर चला गया|

जगमोहन  पुरानी यादों में चला गया था शायद|

आज से कोई 70 साल पहले की बात होगी जब भारत की स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन भी हो गया था| विभाजन रेखा के दोनों तरफ ही बड़ा कत्लेआम और विस्थापन हुआ था| जगमोहन तेजवानी का परिवार सिन्धी परिवार था|

जगमोहन के पिता का पंजाब के राजनपुर जिले के जामपुर क़स्बे में तम्बाकू का व्यापार था| “जामपुर” “सुलतान पहाड़ीयों” और “सिन्धु नदी” से बनी मनोरम वादियों में बसा पंजाब, पकिस्तान की सीमा पर सिंध से सटा क़स्बा था|

तीन भाई-बहनों में बहन सबसे बड़ी थी, एक और छोटा भाई था| माता पिता के साथ ही जगमोहन के दादा दादी भी रहते थे| दूकान के साथ ही घर था| कुछ जमीन जायदाद भी बना रखी थी|

विभाजन के समय जब कत्लेआम शुरू हुआ तो जगमोहन का परिवार भी उस आग की चपेट में आ गया| अपने पुरे परिवार में से बस जगमोहन ही वापस आ पाया था भारत| भारत में जगमोहन को उसकी बुआ ने पाला था| जगमोहन के फूफा सरकारी नौकरी में थे|

विभाजन के समय सरकारी नौकरी वालो की तो अदला बदली दोनों तरफ की सरकारों ने कर ली थीं लेकिन जो किसान या व्यापारी थे वो आग के …

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Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

Untitled 1 copy - Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

साल 1986 की बात है…

शादी के बाद, पहली बार हम अपनी श्रीमती जी को लिवाने “कानपुर धाम” पहुंचे…सूरत से ट्रेन के तीस घण्टे के लंबे सफर के बाद| ट्रेन कानपुर स्टेशन पर रुकते ही एक “कुली महाशय” हमारी सीट पर आकर बोले “पाय लागूं जीजाजी”…

इससे पहले कि हम समझ पाएं कि ये “लाल ड्रेस” वाले “साले साहब” हमारी शादी में क्यूँ नहीं दिखे, इतने में एक और नए “साले साहब” प्लेटफार्म पर उतरते ही चाय लेकर हाज़िर…

असल में हमारे “ओरिजिनल साले साहब” ने कुली से लेकर स्टॉल वाले को हमारे चेहरे मोहरे ,केबिन और सीट नंबर के साथ एक्स्ट्रा टिप दे के रक्खी थी कि “हमार जीजा आय रहे हैं , जरा ध्यान रखना समझे ???

इतने में हमारे “ओरिजिनल” साले साहब बाहें फैलाये चार पांच चेलों चपाटों के साथ प्रकट हुए , मुँह में पान मसाला दबाए लपके …”पाय लागे जीजाजी” कहते हुए की चारों तरफ “फ़िज़ा” में पान मसाले ,गुटके और केसरी तंबाकू की गंध भरी साँसें छा गईं …

स्टेशन से बाहर पैर रखते ही ड्राइवर लखन की “पिचकारी” और “पाय लागूं जीजाजी” से स्वागत हुआ…अब इतना सब होते-होते हमें अपनी उम्र पर शक़ होने लगा कि हम 26 के हैं या 62 के….

मगर ये तो अभी शुरुआत थी…

जॉइंट फैमिली भी माशाअल्लाह “डायनोसोर” जैसी ”जायंट” थी| घर पहुंचते ही दादी सास, सालियाँ ,भाभियाँ ,बुआ, मौसियाँ, बुज़ुर्ग महिलाएं, हर साइज़ के बच्चे बच्चियाँ और हमार सासु माँ दरवाज़े पर हाथ में आरती की थाली लिए स्वागत के लिए तैयार..

माथे पर एक भारी भरकम तिलक पर इतना केसर और चावल चिपकाय दिए गए कि ससुरी “टुंडे” की एक प्लेट “केसरी बिरयानी” बन जाये|

आख़िर बड़ी मुश्किल से सोफे पर बइठे ही थे कि ससुर जी आय गए …”हम फिर पाय लगे”…ससुराल का परिवार इतना बड़ा कि सदस्य “हनुमान जी की पूँछ” की तरह खत्म होने का नाम ही न लें…

पाँय लगने और लगवाने में ही हमार कमर दर्द करने लगी…अब इतने से भी मन न भरा तो हमारी पत्नी की कज़िन ने अपने नवजात शिशु को हमारे हाथों में थमाय दिया …

अले ले ले ले…जीजू आये जी…जू

लेकिन उस “समझदार” शिशु ने “नवजात” जीजू के रुतबे से प्रभावित होने से इनकार कर दिया और गोद में आते ही ज़ोर ज़ोर से प्रलाप करने लगा … इसलिए जल्दी मुक्ति मिल गई|

आखिर तीस घण्टे की यात्रा की थकान से त्रस्त हमने दूर खड़ी पत्नी …

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 Soldier Story | एक हमला वहां भी हुआ होगा

Soldier Story
साथियों, 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी आत्मघाती हमले में देश के 39 जवान शहीद हुए हैं! हर जवान का परिवार आज दुःख और गम के उस पड़ाव पर खड़ा है जिसकी भरपाई शायद ही कभी की जा सके, लेकिन इसी बिच देश के कोने-कोने से शहीदों के परिवारों की हमें कई ऐसी कहानियां (Soldier Story) मिल रही है जो दिल को झकझोर कर रख देने वाली है| इसी बिच हमें हमारे ही एक पाठक ने ऐसी कहानी हमें भेजी है जिसे पढ़कर हमें लगा की यह कहानी देश के हर उस व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक है जो देश से प्यार करता है और देश के लिए मर मिटने को तैयार है| आप सभी पाठकों से बस हमारा यही अनुरोध है की अगर आपके दिल को हमारी यह कहानी थोडा सा भी छु जाए तो कृपया इस कहानी को शेयर कर देश के घर-घर तक पहुँचाने का कष्ट करें!!

एक हमला वहां भी हुआ होगा | Soldier Story

“आज भी फोन नही किया! मैं बात ही नही करूंगी आज…!! फोन करेंगे तो भी नही… कम से कम वेलेंटाइन डे पे कोई फूल ही भेज देते वाट्सएप पर… पर नहीं इन्हें कहाँ समय है हमारे लिए… पिछली बार तो मेरे द्वारा कढाई करके दिल बनाया हुए रुमाल से बन्दूक को घूंघट ओढाकर उसे चूमते हुए फोटो भेजी थी”
इन्ही खयालो को सोचते हुए आज पूनम के होठों पर जरा सी मुस्कान उभर आई! अभी एक साल ही तो हुआ था पूनम और राजेश की शादी को| पूनम जब राजेश से पहली बार मिली थी तभी उसे अपने होने वाले पति के देशप्रेम की जलक साफ देखने को मिल गई थी| पहली मुलाकात में ही राजेश ने पूनम को कह दिया था की इस दुनिया में वह सबसे ज्यादा प्रेम अपनी भारत माता से करता है| शायद यही कारण था की पहली मुलाकात में ही पूनम ने राजेश से शादी के लिए हाँ कर दिया था|
शादी के 10 दिन बाद ही राजेश वापस सरहद पर अपना फ़र्ज़ पूरा करने चल पड़ा था| हालाँकि इन 10 दिनों में भी राजेश और पूनम केवल 3 दिन ही तो साथ रहे थे| लेकिन इन 3 दिनों में पूनम ने अपनी पूरी ज़िन्दगी राजेश के साथ जी ली थी| वापस आने का वादा करके राजेश चला तो गया लेकिन पूनम रोज राजेश के फ़ोन के इंतज़ार में घंटों फ़ोन के पास ही बेठी रहती|
आज भी वह सुबह से राजेश के फ़ोन का इंतज़ार …

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Child Story in Hindi | ये बच्चे कब समझदार होंगे

Child Story in Hindi


Child Story in Hindi | ये बच्चे कब समझदार होंगे

रघुवर प्रसाद जी अब सेवानिवृत्त हो चुके थे| वो अध्यापक थे| उनकी पहचान एक कर्मठ अध्यापक के रूप में थी| अपने कितने ही छात्रों से भावनात्मक रिश्ता था, रघुवर जी का| सेवा निवृत्ति के उपरांत भी कितने ही ऐसे छात्र थे जो सफल थे और यदि कहीं मिल जाते थे तो रघुवर जी के पैरो में पड़ जाते थे| इस सम्मान के आगे अपनी अच्छी खासी पेंशन भी रघुवर जी को छोटी लगती थी| वो अक्सर कहा करते थे “हमने शिक्षा को संस्कार के रूप में विद्यार्थियों में रोपा है, अब तो शिक्षा भी सर्विस सेक्टर का हिस्सा है… शिक्षक के लिए छात्र एक ग्राहक है, तो छात्र और उनके माता पिता के लिए शिक्षक एक सार्विस प्रोवाईडर|” फिर वो एक लम्बी साँस खिंच कर बोलते “सही समय में जिंदगी गुजार गए हम….”

रघुवर जी के एक पुत्री और दो पुत्र थे| बड़ा पुत्र इन्द्र इंजिनियर था! वह अपनी पत्नी रेखा, एक पुत्र रोहन और एक पुत्री रोहिणी के साथ चंडीगढ़ में रहता था| जबकि छोटा पुत्र राजेंद्र, रघुवर जी के साथ रहता था| वो एक अच्छी कम्पनी में नौकरी करता था| ठीक ही कमा लेता था| उसके भी एक पुत्र शिखर और एक पुत्री शिखा थी| रघुवर जी की पत्नी प्रेमलता और पुत्री आभा और छोटे पुत्र का परिवार उनके साथ उनके पैत्रक निवास “मेरठ” में ही में रहते थे| अभी पुत्री का विवाह नहीं हुआ था| बस ये ही एक चिंता रघुवर जी को थी की नौकरी रहते पुत्री का विवाह नहीं हो पाया| प्रेमलता जी भी इस विषय को लेकर थोडा परेशान रहती थी| इस कारण से ही रघुवर जी ने अपने फंड को किसी को नहीं दिया था| वो सोचते थे की बस आभा का विवाह बिना पुत्रो पर जोर डाले ठीक से करके जो बचेगा वो पुत्रो को दे देंगे|

रघुवर जी जितने मृदुभाषी थे, प्रेमलता जी उतनी ही कड़क स्वाभाव की थी| वो ज्यादा पढ़ी-लिखीं नहीं थी फिर भी किसी भी विषय पर अड़ जाना उनका स्वभाव था| रघुवर जी ने जीवन भर उनकी बात काटने की हिम्मत नहीं जुटाई थी| ये ही स्वभाव प्रेमलता का बहुओ के साथ भी था| बड़ी बहु आधुनिक परिवार से थी| और प्रेमलता जी का बड़ा पुत्र भी अच्छा कमाता था इसलिए प्रेमलता जी की अपनी बड़ी बहु से ज्यादा बनी  नहीं| पोती-पोतो की याद तो रघुवर जी और प्रेमलता जी को भी आती थी, परन्तु प्रेमलता जी भी झुकने …

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