मेरा कर्त्तव्य : घनश्यामदास जी बिड़ला का प्रेरक प्रसंग | Ghanshyamdas Birla Prerak Prasang

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Ghanshyamdas Birla Prerak Prasang: पद्म विभूषण से सम्मानित श्री घनश्यामदास जी बिड़ला भारत के अग्रणी औद्योगिक समूह बी.के.के.एम. बिड़ला के संस्थापक होने के साथ ही स्वाधीनता सेनानी भी थे. वे महात्मा गांधी के परम मित्र, परामर्शदाता और सहयोगी थे. यह प्रेरक प्रसंग उनके जीवन से जुड़ा हुआ है.

एक दिन की बात है. श्री घनश्यामदास जी बिड़ला (Ghanshyamdas Ji Birla) रोज़ की तरह कार से अपने ऑफिस जा रहे थे. वे कार की पिछली सीट पर बैठे हुए थे.

उस दिन ड्राईवर कार तीव्रगति से चला रहा था. उनकी कार जब एक तालाब के किनारे से गुज़री, तो वहाँ उपस्थित भीड़ के कारण कार की रफ़्तार धीमी करनी पड़ी.

श्री घनश्यामदास जी बिड़ला (Ghanshyamdas Ji Birla) ने भीड़ देखकर ड्राइवर से पूछा, “इतनी भीड़ कैसे जमा है यहाँ पर? कुछ हो रहा है क्या?”

“सर! लगता है कोई तालाब में डूब गया है.” ड्राइवर ने जवाब दिया.

ये सुनना था कि श्री घनश्यामदास जी बिड़ला ने तुरंत कार रुकवाई और झटके से कार उतर गए.

कार से उतरकर वे तालाब के पास पहुँचे. वहाँ उन्होंने देखा कि एक ८-९ वर्ष का बालक पानी में डूब रहा है. तालाब के आस-पास खड़ी भीड़ उसे बचाने के लिए चिल्ला रही है. लेकिन कोई उसे बचाने के लिए आगे नहीं बढ़ रहा हैं.

श्री घनश्यामदास जी बिड़ला ने कोट-पेंट और जूते पहने हुए ही तालाब में छलांग लगा दी. तैरकर उस बच्चे के पास पहुँचे और उसे बाहर निकाल ले आये.

वहाँ से वे बच्चे को लेकर सीधे अस्पताल पहुँचे. डॉक्टर ने बच्चे का प्रारंभिक उपचार करने के बाद उसकी जान ख़तरे से बाहर बताई. तब बिड़ला जी अपने ऑफिस गए. ऑफिस में उन्हें उस हालत में देखकर सारे कर्मचारी आश्चर्यचकित थे.

जब सबको पता चला कि बिड़ला जी ने एक बच्चे को डूबने से बचाया है, तो वे उनकी प्रशंषा करने लगे. बिड़ला जी ने उस प्रशंषा की ओर ध्यान न देकर बस इतना कहा, “ये तो मेरा कर्त्तव्य था.” और अपने केबिन की ओर बढ़ गए.

ऐसे थे श्री घनश्यामदास जी बिड़ला, जो मानवता और सेवाधर्म को अपना कर्त्तव्य मानते थे.…

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स्कूल में दो बार फेल होने वाले ने कैसे बनाई देश की सबसे बड़ी फ़ूड डिलीवरी कंपनी | Zomato Success Story

Deepinder Goyal Zomato Success Story In Hindi
Zomato Success Story In Hindi | Image Source : hindustimes.com

Deepinder Goyal Zomato Success Story In Hindi : जब भी किसी रेस्टोरेंट का खाना खाने का मन करे, तो हम मोबाइल उठाकर online food order कर देते हैं और कुछ ही समय में हमारा मनपसंद खाना हमारे घर पर होता है. सब कुछ कितना आसान है, क्यों? क्योंकि Zomato है ना!

जीहाँ दोस्तों आज के दौर में घर बैठे food order करना बहुत आसान हो गया है और ऐसा होने के पीछे Zomato का बहुत बड़ा हाथ है. अपने ऑफिस के कैफेटेरिया में ऑफिस के स्टाफ की समस्या का समाधान करने का एक छोटा सा आईडिया दीपेंद्र गोयल (Deepender Goyal) के दिमाग में आया और उस आईडिया ने zomato media pvt ltd company को जन्म दे दिया. इसमें उनके साथी रहे co-founder पंकज चड्ढा (Pankaj Chaddha).

दीपेंद्र गोयल (Deepinder Goyal) ने किस तरह zomato को सफ़लता की बुलंदियों तक पहुँचाया, आइये जानते हैं zomato success story में :

दीपेंद्र गोयल का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

दीपेंद्र गोयल का जन्म पंजाब (Panjab) के मुत्तसर (Muktsar) जिले में हुआ था. उनके माता और पिता दोनों ही शिक्षक थे. लेकिन शिक्षक परिवार से संबंधित होने के बावजूद दीपेंद्र कक्षा छटवीं तक पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं थे. छटवीं कक्षा में फेल होने के बाद उनकी आँखें खुली और उन्होंने पढ़ाई के प्रति अपने नज़रिए में परिवर्तन किया. हालांकि राह इतनी भी आसान नहीं थी.

आठवीं में शिक्षक के द्वारा सारे उत्तर बताये जाने के कारण वे कक्षा में प्रथम आ गए. ९वीं और १० वीं में उनका रिजल्ट अच्छा रहा, जिससे उनके आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी हुई. लेकिन १०वीं के बाद चंडीगढ़ के डीएवी स्कूल में दाखिला लेने के बाद वे फिर से फेल हो गए. जैसे-तैसे उन्होंने अपना आत्मविश्वास बटोरा और दिल लगाकर पढ़ाई करने लगे. फलस्वरूप १२वीं के बाद उन्होंने आईआईटी प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर आईआईटी दिल्ली में प्रवेश ले लिया.

२००५ में IIT Delhi से दीपेंद्र ने ‘मैथ्स एंड कंप्यूटिंग’ में इंटीग्रेटेड एमटेक (Integrated M. Tech. In Mathematics And Computing) की डिग्री हासिल की. एमटेक की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्हें Bain & Company में consultant की जॉब मिल गई. २००७ में उन्होंने कंचन जोशी से शादी कर ली, जो आईआईटी दिल्ली में उनकी सहपाठी थीं.

Foodiebay.com की शुरूवात

अच्छी जॉब के बाद भी दीपेंद्र संतुष्ट नहीं थे. उनका दिमाग हर वक़्त business ideas के बारे में सोचा करता था. एक दिन उन्हें अपने ऑफिस के …

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लोगों के बाल काटने वाला नाई कैसे बना अरबपति, जानिए रमेश बाबू के बिलियनर बार्बर बनने की कहानी

Ramesh Babu Billionaire Barber Inspiring Story In Hindi : कभी एक वक़्त के खाने को तरसने वाले की किस्मत यूं पलटी कि आज वह ३.५ करोड़ की कार Rolls Royce में घूमता है, ४०० से अधिक कारों का मालिक है और पूरे देश में ‘Billionaire Barber’ के नाम से मशहूर है.

ये कहानी है ‘Barber’ से ‘Billionaire Barber’ तक का सफ़र तय करने वाले बैंगलोर के रमेश बाबू (Ramesh Babu) की. गरीबी की चादर में लिपटे उनका बचपन बीता. लेकिन उन्होंने खुद को कभी उस चादर के दायरे में नहीं समेटा. बल्कि अपनी आँखों में सपने सजाये और उन सपनों को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया. आज वे लोगों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गए हैं.

आइये जानते हैं रमेश बाबू (Ramesh Babu) की सफ़लता की पूरी कहानी :

Ramesh Babu Billionaire Barber Inspiring Story In Hindi
Ramesh Babu Billionaire Barber Inspiring Story | Image Source : economictimes.indiatimes.com

रमेश बाबू (Ramesh Babu) का जन्म कर्नाटक (Karnataka) राज्य के बैंगलोर (Bangalore) शहर में एक गरीब परिवार में हुआ था. पिता नाई (Barber) थे. ब्रिगेड रोड में उनका छोटा सा सैलून (Salon) था. लोगों के बाल काटकर जो आमदनी होती, उससे परिवार की गुजर-बसर होती थी.

आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार पर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा, जब रमेश बाबू के पिता का देहांत हो गया. उस समय रमेश बाबू की उम्र मात्र ७ वर्ष थी.

पिता के जाने के बाद घर चलाने की ज़िम्मेदारी रमेश बाबू की माँ के  कंधों पर आ गई. वे लोगों के घरों में बर्तन मांजने, साफ़-सफाई और खाना बनाने का काम करने लगी.

सैलून का काम रमेश के चाचा को सौंप दिया गया. सैलून व्यवसाय से होने वाली कमाई में से ५ रुपये रमेश के चाचा उनकी माँ को दिया करते थे. वह एक कठिन दौर था. उनके परिवार को एक वक़्त का खाना भी बड़ी मुश्किल से नसीब हो पाता था.

मिडिल स्कूल में आने के बाद रमेश बाबू माँ का हाथ बंटाने के उद्देश्य से छोटे-मोटे काम करने लगे. सुबह उठकर वे अखबार बांटते, घरों में दूध की सप्लाई करते थे. इसके अलावा भी जो काम मिलता, वे करते. ताकि कुछ पैसे कमा कर माँ को दे सके.   

किसी तरह उन्होंने १०वीं की पढ़ाई पूरी की. जब वे ११वीं कक्षा में थे, तब एक दिन उनकी माँ का किसी बात पर उनके चाचा से झगड़ा हो गया और उनके चाचा के उन्हें रोज़ …

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पापड़ बेचने से लेकर ‘सुपर ३०’ तक का सफ़र, “आनंद कुमार” की सफ़लता की प्रेरणादायक कहानी

Anand Kumar Super 30 Biography & Success Story In Hindi : भारत में IIT जैसे टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने का सपना कई छात्र-छात्रायें देखते है. ऐसे में उनका मार्गदर्शक बनती हैं – कोचिंग संस्थायें. लेकिन कोचिंग संस्थाओं की भारी-भरकम फीस वहन कर पाना हर छात्र के लिए संभव नहीं हो पाता. जो आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के छात्र हैं, वे यह मार्गदर्शन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं और कहीं न कहीं यह उनके इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में सफ़लता प्राप्ति में अडंगा बन जाता है.

ऐसे में आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों के लिए मसीहा बनाकर उभरे हैं – आनंद कुमार (Anand Kumar), जो अपने सुपर ३० संस्थान में ऐसे छात्रों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं और उनकी न सिर्फ टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज (Top Engineer College) में प्रवेश का मार्ग, बल्कि उज्जवल भविष्य का मार्ग भी प्रशस्त कर रहे हैं.

आनंद कुमार एक गणितज्ञ, शिक्षाविद और स्तंभकार हैं, जिन्होंने आर्थिक विपन्नता का जीवन करीब से से देखा है. उनका संपूर्ण बचपन अभावों में व्यतीत हुआ. लेकिन उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा संबल माना. कैम्ब्रिज युनिवेर्सिटी का कॉल लैटर हाथ में होने के बाद भी आर्थिक तंगी के कारण वे कैम्ब्रिज न जा सके. गली-गली पापड़ बेचने को मजबूर हुए. लेकिन आज वे इस मुकाम पर हैं, जहाँ वे समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों के शैक्षिक उत्थान की दिशा सराहनीय कार्य कर रहे हैं.

आनंद कुमार के कार्यों को देश-विदेश में सराहना प्राप्त हुई है और उन्हें कई पुरुस्कारों से नवाज़ा गया है. वे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा श्रोत है. उनके प्रेरणादायक जीवन पर आधारित हिंदी फिल्म ‘सुपर ३०’ (Super 30) का निर्माण भी किया गया है. आइये विस्तार से जानते हैं आनंद कुमार (Anand Kumar) और उनके संस्थान  ‘सुपर ३०‘ (Super 30) के बारे में :      

Anand Kumar Super 30 Biography & Success Story In Hindi
Anand Kumar Super 30 Biography & Success Story In Hindi

 आनंद कुमार का संक्षिप्त परिचय (Short Biography Anand Kumar) 

नाम  आनंद कुमार  (Anand Kumar)
जन्म १ जनवरी १९७३ 
जन्म स्थान पटना. बिहार (Patna, Bihar, India)
माता जयंती देवी 
भाई प्रणव कुमार 
पत्नि ऋतु रश्मि 
बेटा जगत कुमार 
कार्य शिक्षक, गणितज्ञ
उपलब्धि सुपर ३० संस्थान के द्वारा आर्थिक रूप से कमज़ोर विद्यार्थियों को IIT की निशुल्क कोचिंग,  हर वर्ष २६ से ३० बच्चों का चयन. इस सराहनीय कार्य के लिए कई पुरुस्कार और सम्मान से नवाज़ा
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१२ साल डिप्रेशन से घिरा व्यक्ति कैसे ६० साल की उम्र में बना सुपर मॉडल? (Model Dinesh Mohan Success Story)

Dinesh Mohan Model Inspirational Story In Hindi : मॉडल और एक्टर दिनेश मोहन (Dinesh Mohan) को ६० साल का जवान कहा जाये, तो गलत नहीं होगा. इस उम्र में भी उनकी फ़िटनेस और एनर्जी युवाओं को मात देती नज़र आती है.

देश के नामी-गिरामी फैशन डिज़ाइनर्स के लिए रैंप वाक (Ramp Walk) और मॉडलिंग (Modeling) कर चुके दिनेश मोहन (Dinesh Mohan Model)को देख हर कोई यही सोचता है कि ये बंदा चकाचौंध की दुनिया का ही बाशिंदा रहा होगा. लेकिन उनके जीवन की गहराई में उतरकर झांकने पर एक अलग ही तस्वीर नज़र आती हैं. 

फैशन जगत की चकाचौंध में रहकर भी दिनेश मोहन अपनी जिंदगी के वे साल नहीं भूलते, जो उन्होंने अंधेरे में गुजारे. १२ साल एक लंबा अरसा होता है. १२ साल तक डिप्रेशन के अंधेरे में रहने वाले दिनेश ने फैशन की जगमगाती दुनिया का जो सफ़र तय किया है, वो वास्तव में प्रेरणादायक है.

Dinesh Mohan Model Inspirational Story In Hindi
Dinesh Mohan Model Inspirational Story : Image Source : thehindu.com

आइये जानते हैं १२ साल तक डिप्रेशन (Depression) के शिकार रहे दिनेश मोहन की ६० की उम्र में सुपर मॉडल बनने की प्रेरणादायक कहानी (Motivational Story) :

दिनेश मोहन (Dinesh Mohan) की जिंदगी एक आम व्यक्ति की तरह ही थी. पढ़ाई पूरी कर अच्छी नौकरी, पैसा, शादी और व्यवस्थित जिंदगी. दिनेश ने पढ़ाई पूरी कर एक अच्छी सरकारी नौकरी हासिल की. वे चंडीगढ़ (Chandigarh) में स्वास्थ्य विभाग में प्रथम श्रेणी ऑफिसर थे.

माता-पिता ने अच्छी लड़की देख शादी कर दी और बस यहीं से दिनेश की जिंदगी बदल गई. एक बेहतर शादी-शुदा जिंदगी की उनकी चाहत पूरी नहीं हो पाई. उनके और उनकी पत्नि के विचारों में अक्सर टकराव होता रहा, जो कहीं न कहीं पारिवारिक कलह का कारण बना. इसका असर यह हुआ कि दिनेश तनाव में रहने लगे.

१० साल तक पारिवारिक तनावपूर्ण वातावरण में रहने के बाद आखिरकार उन्होंने अपनी पत्नि से तलाक लेने का फ़ैसला किया. तलाक के बाद उनके बेटे की कस्टडी उनकी पत्नि को मिली और वे अकेले रह गए.

कुछ अरसा गुजरा और एक रोज़ उनका बेटा उनके पास वापस आ गया. कारण, उनकी पत्नि का देहांत. बेटे के मन में पिता के प्रति कड़वाहट भरी हुई थी, जो धीरे-धीरे ही सही पिघलने लगी. दिनेश भी अपने बेटे के साथ ख़ुश रहने लगे.

लेकिन शायद ये ख़ुशी उनकी किस्मत में नहीं थी. होनी को कुछ और ही मंजूर …

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सड़क किनारे ठेले में अंडे बेचने वाला कैसे बना उदयपुर का ‘एग किंग’? | Egg king Of Udaipur Motivational Success Story In Hindi

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Egg King Udaipur Motivational Success Story In Hindi : जब हौसला उड़ान भरता है, तो अंबर भी आपको सलाम करता था. लगता है ये वाक्य जय कुमार वलेचा (Jay Kumar Valecha) के लिए ही बना है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपने हौसलों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

बचपन तो मानो उन्होंने देखा ही नहीं. परिस्थियाँ ऐसे बनी कि १२ वर्ष की छोटी उम्र में बीमार पिता, माता, भाई-बहनों और पूरे परिवार का दायित्व अपने कंधों पर उठाने के लिए विवश हो गए.

उस समय जय कुमार के नन्हें कंधे भले ही उतने मजबूत ना थे, पर सपने बड़े थे, हौसले बुलंद थे और जिंदगी में कुछ बड़ा कर गुजरने का ज़ज्बा दिल में भरा पड़ा  था. उसी ज़ज़्बे के बदौलत उदयपुर (Udaipur) में सड़क किनारे ठेले पर अंडा भुर्जी बेचने वाला मामूली सा लड़का जय कुमार वलेचा आज उदयपुर में ‘उदयपुर का एग किंग’ (Egg King Udaipur) के नाम से मशहूर है.

कैसे संभव हो सका ये? क्या सब कुछ इतना आसान था? आखिर ऐसा क्या किया जय कुमार ने कि कभी सड़कों की धूल फांकने वाला आज लाखों की गाड़ी में घूमता है. ये जानने के लिए पढ़िये motivational success story of Egg King of Udaipur :

Egg King Udaipur | Image Source : udaipurbeats.com

ये Story है – Jay Kumar Valecha (जय कुमार वलेचा) की, जिन्हें गरीबी विरासत में मिली थी. पिता उदयपुर में सड़क किनारे ठेले पर अंडा भुर्जी (anda bhurji), आमलेट (omelette) और उबले अंडे (boiled egg) बेचा करते थे. कमाई इतनी नहीं थी कि घर की आर्थिक स्थिति संबल हो पाती.

घर की बिगड़ती आर्थिक स्थिति देख जय कुमार (Jay Kuar Valecha) ने चौथी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया और अपने पिता के धंधे में हाथ बंटाने उनके साथ हो गए. वे पिता के साथ ठेले को धक्का लगाते और सड़क किनारे खड़े करके अंडे बेचते थे. पिता को देख-देखकर जय कुमार ने छोटी सी उम्र में ही अंडा भुर्जी और ऑमलेट बनाना सीख लिया.

यदि ऐसा कहा जाये कि जय कुमार ने बचपन ही नहीं देखा, तो गलत नहीं होगा. उनका बचपन अन्य बच्चों से अलग था. डायबिटीज के रोगी पिता ने जब गुर्दे ख़राब होने पर बिस्तर पकड़ लिया, तब घर चलाने की पूरी जिम्मेदरी जय कुमार के नाज़ुक कंधों पर आ गई.

बीमार पिता, दो छोटी बहनों और भाई को संभालने के …

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