Urdu Mehfil Shayari – Parveen Shakir,Ibrahim Zauq,Jigar Moradabadi & Muneer Niyazi

Mehfil shayari - Urdu Mehfil Shayari – Parveen Shakir,Ibrahim Zauq,Jigar Moradabadi & Muneer Niyazi



ख्याल जिसका था मुझे ख्याल में मिला मुझे 
सवाल का जवाब भी सवाल में मिला मुझे

BY Poetry – MUNEER NIYAZI

हम तो समझे थे की एक ज़ख़्म है भर जायेगा 
क्या खबर थी की रग-ऐ -जान में उतर जायेगा

BY Poetry – Parveen Shakir

पास जब तक वो रहे दर्द थम जाता है 
फ़ैल जाता है फिर आँख के काजल की तरह

BY Poetry – Parveen Shakir

तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे 
न खुद की हो परवाह न खुदा याद रहे

BY Poetry – Ibrahim Zauq

हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझ पर 
बाकि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जायेंगे

BY Poetry – Ibrahim Zauq

क्या जाने उसे वहां है क्या मेरी तरफ से 
जो ख्वाब में भी रात को तनहा नहीं आता

BY Poetry – Ibrahim Zau

मेरी ज़िन्दगी तो गुज़री तेरे हिजर के सहारे 
मेरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना

BY Poetry – Jigar Moradabadi

कुछ खटकता तो है पहलु में मेरे रह रह कर 
अब खुदा जाने तेरी याद है या दिल मेरा

BY Poetry – Jigar Moradabadi


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shayarisms4lovers June18 202 - Best Ever Shayari Colletion of Munir Niazi – मुनीर नियाज़ी शायरी मजमूआ

Best Ever Shayari Colletion of Munir Niazi – मुनीर नियाज़ी शायरी मजमूआ

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उसके जाने का रंज

मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गयी
पर मैं बुला रहा था जिसे , वो बेखबर रहा
उसकी आखिरी नज़र में अजब दर्द था “मुनीर”
उसके जाने का रंज मुझे उम्र भर रहा

Uske Jaane Ka Ranj

Meri Sada Hawa Mein Bohat Door Tak Gayi
Par Main Bula Raha Tha Jise, wo Bekhabar Raha
Uski Aakhiri Nazar Mein Ajab Dard Tha “Munir”
Uske Jaane Ka Ranj Mujhe Umar Bhar Raha


हम जवाब क्या देते

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे ग़लत थे, हम जवाब क्या देते
हवा की तरह मुसाफिर थे, दिलबरों के दिल
उन्हें बस एक ही घर का अजाब क्या देते

Hum Jawab Kya Dete

Kisi Ko Apnay Amal Ka Hisaab Kya Dete
Sawaal Saare Ghalat The, Hum Jawab Kya Dete
Hawa Ki Tarha Musafir The, Dilbaron Ke Dil
Unhain Bus Ak Hi Ghar Ka Azaab Kya Dete


ज़ुल्म मेरे नाम

शहर में वो मोअतबर मेरी गवाही से हुआ
फिर मुझे इस शहर में नमोअतबर उसी ने किया
शहर को बर्बाद करके रख दिया उस ने “मुनीर”
शहर पर यह ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया

Zulam Mere Naam

Shehar mein wo moatbir meri gawahi se huwa
Phir mujhe is shehar mein namoatbir usi ne kiya
Shehar ko barbaad kar kay rakh diya us ne “Munir”
Shehar par yeh zulam mere naam per usi ne kiya


ऐसे भी हम नहीं

ग़म से लिपट जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
दुनिया से कट ही जाएंगे ऐसे भी हम नही
इतने सवाल दिल में हैं और वो खामोश देर
इस देर से हट जाएंगे ऐसे भी हम नहीं

Aise Bhi Hum Nahi

Gham say lipat jaingay Aise bhi hum nahi
Duniya say kat hi jaingay Aise b hum nahi
Itnay sawal dil mein hain or wo khamosh der
Is der say hat jaingay Aise bhi hum nahi


गम की बारिश

गम की बारिश ने भी तेरे नक़्श को धोया नहीं
तूने मुझ को खो दिया मैंने तुझे खोया नहीं
जानता हूँ एक ऐसे शख्स को मैं भी “मुनीर”
गम से पत्थर हो गया लेकिन कभी रोया नहीं

Gam Ki Barish

Gam ki barish ne bhi tere naqsh ko dhoya nahin
Tune mujh ko khoo diya mainne tujhe khoya nahin
Janata hoon Ek aise shaKhs ko main bhi “Munir”
Gam se patthar ho gaya lekin kabhi roya nahin


शहर-ऐ-संगदिल

इस शहर-ऐ-संगदिल को जला देना चाहिए
फिर इस की ख़ाक को भी उड़ा देना …

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shayarisms4lovers mar18 140 - ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – मुनीर नियाज़ी

ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – मुनीर नियाज़ी

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ज़िन्दगी की किताब

यह जो ज़िन्दगी की किताब है
यह किताब भी क्या किताब है
कहीं एक हसीं सा ख्वाब है
कहीं जान लेवा अज़ाब है

मुनीर नियाज़ी – ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – यह जो ज़िन्दगी की किताब है


Zindgi ki Kitab

Yeh jo Zindgi ki kitab hai
Yeh kitab bhi kya kitab hai
Kahin ek haseen sa khwab hai
Kahin jaan levaa azaab hai

Munir Niazi – Zindgi ki kitab Urdu Shayari – Yeh jo Zindgi ki kitab hai

रहमतों की हैं बारिशें

कभी खो दिया कभी पा लिया
कभी रो लिया कभी गा लिया
कहीं रहमतों की हैं बारिशें
कहीं तिशनगी बेहिसाब है

मुनीर नियाज़ी – ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – कभी खो दिया कभी पा लिया


Rehmaton ki Hain Barishain

Kbhi kho diya kbhi pa liya
Kabhi ro liya kbhi gaa liya
Kahin rehmaton ki hain barishain
Kahin tishnagi behisab hai

Munir Niazi – Zindgi ki kitab Urdu Shayari – Kbhi kho diya kbhi pa liya

वो क़यामतें जो गुज़र गयीं

कोई हद नहीं है कमाल की
कोई हद नहीं है जमाल की

वो ही क़ुर्ब-ओ-दौर की मंज़िलें
वो ही शाम खवाब-ओ-ख्याल की

न मुझे ही उसका पता कोई
न उसे खबर मेरे हाल की

यह जवाब मेरी सदा का है
के सदा है उसके सवाल की

वो क़यामतें जो गुज़र गयीं
थी अमानतें कई साल की

यह नमाज़-ऐ-असर का वक़्त है
यह घडी है दिन के ज्वाल की

है “मुनीर ” सुबह -ऐ -सफर नया
गयी बात शब् के मलाल की

मुनीर नियाज़ी – ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – वो क़यामतें जो गुज़र गयीं


Wo Qayamatein Jo Guzar Gayein

Koi had nahi hai kamaal ki
Koi had nahi hai jamaal ki

Wo hi qurb-O-daur ki manzilein
Wo hi sham khawab-O-khyaal ki

Na mujhe hi uska pata koi
Na use khabar mere haal ki

Yeh jawaab meri sada ka hai
Ke sada hai uske sawaal ki

Wo Qayamatein Jo Guzar Gayein
ThiN amanaten kayee saal ki

Yeh namaaz-AE-asar ka waqt hai
Yeh ghadi hai din ke zawaal ki

Hai “MONIR” subh-AE-safar naya
Gayee baat shab ke malaal ki

Munir Niazi – Zindgi ki kitab Urdu Shayari – Wo Qayamatein Jo Guzar Gayein

दिल की खलिश

ज़िंदा रहे तो क्या है जो मर जाएं हम तो क्या
दुनिया से ख़ामोशी से गुज़र जाएं हम तो क्या

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने
एक ख्वाब है जहां में बिखर जाएं हम तो क्या…

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