shayarisms4lovers mar18 190 - शायरी – एक मुसाफिर अजनबी

शायरी – एक मुसाफिर अजनबी

< ?xml encoding="utf8mb4" ?>

मुसाफिर के रास्ते बदलते रहे

मुसाफिर के रास्ते बदलते रहे , मुक़द्दर में चलना था चलते रहे
मेरे रास्तों में उजाला रहा , दीये उसकी आँखों में जलते रहे

कोई फूल सा हाथ कंधे पे था , मेरे पाओं शोलों पे चलते रहे
सुना है उन्हें भी हवा लग गयी , हवाओं के जो रुख बदलते रहे

वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया , मगर उम्र भर हाथ मलते रहे
मोहब्बत , अदावत , वफ़ा , बेरुखी , किराये के घर थे बदलते रहे
लिपट कर चिराग़ों से वो सो गए , जो फूलों पे करवट बदलते रहे..


मुसाफिर के साथ तू ने क्या किया

इस राह -ऐ -उल्फत के मुसाफिर के साथ तू ने क्या किया
कभी अपना लिया कभी ठुकरा दिया

मेरी मोहब्बत तेरे नाम का मुहाल तो नहीं
कभी बना लिया कभी गिरा दिया

मैं तेरी किताब -ऐ -ज़िंदगी का वो हर्फ तो नहीं हूँ जिसे
कभी लिख लिया कभी मिटा दिया

मेरा साथ तेरे लिए बाईस-इ-रुस्वाई तू नहीं जिसे
कभी दुनिया को बतला दिया कभी छुपा लिया

आज कल लोगों का यही मशग़ला है “मुसाफिर”
कभी हमें सोच लिया तो कभी भुला दिया..


ऐ मुसाफिर

दुनिया के ऐ मुसाफिर मंज़िल तेरी कब्र है
और जिस सफर पर तू चला है , दो दिन का वो सफर है..


अजनबी मुसाफिर

अजनबी राहों के अजनबी मुसाफिर
आ कर मुझसे पूछ बैठा है रास्ता बता दो गे

अजनबी राहों के , अजनबी मुसाफिर सुन
रास्ता कोई भी हो , मंज़िले नहीं मिलती

मंज़िलें तो धोखा हैं , मंज़िलें जो मिल जायें
जुस्तुजू नहीं रहती , ज़िन्दगी को जीने की आरज़ू नहीं रहती ..


एक गुमनाम मुसाफिर

एक गुमनाम मुसाफिर की तरह चुपके से
खुद को इस भीड़ में खो देने को जी चाहता है

इक इरादा ख़ाक की हर दुःख से दिला देगी निजात
खुद को मट्टी में समा देने को जी चाहता है

दर्द ऐसा है के मरहम की बजाए ‘मुसाफिर’
दिल में निश्तर सा चुभो देने को जी चाहता है..


मुसाफिर घर का रास्ता भूल गया

दर बेदर फिरा मुसाफिर घर का रास्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया

कैसे दिन थे कैसी रातें कैसी बातें बीत गयी
मन बालक है पहले पियार का सुन्दर सपना भूल गया

याद के फेर में आकर दिल पर ऐसी फिर एक चोट लगी
दुःख में सुख है सुख में दुःख है भेद यह करना भूल गया

एक नज़र की एक ही पल की …

Continue Reading