shayarisms4lovers mar18 162 - जब भी गुज़रे हैं किसी दर्द के बाजार से हम – परवीन शाकिर शायरी

जब भी गुज़रे हैं किसी दर्द के बाजार से हम – परवीन शाकिर शायरी

अक्स -ऐ -खुशबू हूँ अक्स -ऐ -खुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई और फिर बिखरु तो मुझ को न समेटे कोई . काँप उठती हूँ मैं यह सोच के तन्हाई में मेरे चेहरे पे तेरा नाम न पढ़ ले कोई अब तो इस राह से वो शख्स गुज़रता भी नहीं अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई कोई आहट , कोई आवाज़ , कोई चाप नहीं दिल की गालियां बड़ी सुनसान हैं आये कोई Aks-ae-khushboo hoon Aks-ae-khushboo hoon bikherne se na roke koi aur phir bikharjaoun to mujh ko na samete koi.   kaanp uthti hoon main yeah soch ke tanhayii mein…. mere chehre pe tera naam na padh le koi ab to iss rah se wo shakhs guzarta bhi nahi.. ab kis umeed pe darwaze se jhanke koi Koi aahat, koi awaz, koi chaap nahi, dil ki ghaliyaan bari sunsaan hein aaye koi. हुई बर्बाद मोहबत कैसे ज़िंदगी पर किताब लिखूंगी उस में सारे हिसाब लिखूंगी प्यार को वक़्त गुज़ारी लिख कर चाहतों को अज़ब लिखूंगी हुई बर्बाद मोहबत कैसे कैसे बिखरे हैं ख्वाब लिखूंगी अपनी ख्वाहिश का तजकरा कर के उस का चेहरा गुलाब लिखूंगी मैं उस से जुदाई का सबब अपनी किस्मत खराब लिखूंगी … […]

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