shayarisms4lovers June18 233 - Poem in Hindi | शायरी हिंदी में

Poem in Hindi | शायरी हिंदी में

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Poem in Hindi | शायरी हिंदी में

साथियों नमस्कार, Hindi Short Stories के इस नए अंक Poem in Hindi | शायरी हिंदी में आपका स्वागत है! इस अंक में हम आपको विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई शायरियों और कविताओं से रूबरू करवाने जा रहें हैं !


Poem in Hindi | शायरी हिंदी में

गुलज़ार

सौंप गज़ल-ए-बहार मुझे गुलज़ार कर दिया,
दे दस्तार मेरा हैरती श्रृंगार कर दिया!

देख जुल्फ़ की घटाएं मेरी आँख न खुली,
मुझे नजरों के ख़त से बीमार कर दिया!!

बन मनसूब की थी मेरे क़त्ल की साजिश,
मेरे रक़ीब ने मुझे खबरदार कर दिया!

 

सकत बाकी तो थी मरसिया की मुझमें,
दे बख्तर मेरे हाथ, गुनहगार कर दिया!!

यूँ छोड़ उसको, कोई मुझे जान न सका,
भेज खबरें मिरी उसी ने अखबार कर दिया!!

बावजूद ग़म के मैंने चाहा था उसका साथ,
करके दोज़ख उसने हमें बेज़ार कर दिया!!

वो तो भला हुआ मिरी अम्मा ने मख़मूर,
दे आँचल का शामियाना मुझे, ज़मीदार कर दिया..!!

{दस्तार- पगड़ी / रक़ीब- दुश्मन
सकत- सामर्थ्य / मरसिया- शोकगीत
बख्तर- कवच / दोज़ख- नरक}

@अंकेश वर्मा


“वो पिघलती रही”

में जलता रहा
वो पिघलती रही
वो मोम सी हुई
में सूत सा कोई
दूरियां नहीं थी दिलों में कोई
बस में टूटता रहा
वो बिखरती रही
मुलाकातों का सिलसिला
बहुत कम सा रहा
दरमियाँ इश्क में
ये यक़ीनन हुआ…
हम बिछडते गए
प्यार बढ़ता गया…
बातें अब ना के बराबर खो सी गई है
शायद थककर चुपके से सो सी गई है
डर ये भी रहा की…
सिसकियों की आहात न हों
दर्द मुझे होता रहा
आह उसकी निकलती रही
में जलता रहा
वो पिघलती रही

“यश”
यशोदा नाग


“अब जीत यहाँ पर किसकी हैं”

मैं हार गया तू हार गया, अब जीत यहाँ पर किसकी हैं,
है चाँद नही निकला छत पर, अब ईद यहाँ पर किसकी है।
ख़ामोश रहूँ या सोर करूँ, अब रीत यहाँ पर किसकी हैं,
सपने वादे सब टूट गया, अब उम्मीद यहाँ पर किसकी है।
हैं आँखो में बहता दरिया, अब नींद यहाँ पर किसकी हैं,
बाक़ी है क्या जो खोना है, अब सीख यहाँ पर किसकी हैं।
मैं हार गया तू हार गया, अब जीत यहाँ पर किसकी हैं।


“मुझको तुम यूँही उदास रहने दो”

मुझको तुम यूँही उदास रहने दो।
अपनी यादों को मेरे आस पास रहने दो।।
मत करो कोशिशें दूरियाँ मिटाने की,
ज़मीं को जमीं आसमान को आसमान रहने दो।।
बन जाओ समंदर सा अगर बन सको तो,
लौट कर …

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“झाँसी की रानी” कविता | Jhansi ki Rani Poem

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Jhansi Ki Rani

दोस्तों, बचपन से ही हमनें झाँसी की राणी लक्ष्मीबाई की वीरता के बहुत से किस्से सुने होंगे। हम बचपन में स्कूल के प्रोग्राम में कभी झाँसी की राणी भी बने होंगे। उनकी वीरता को बताने के लिए शब्द भी कम पड़ते हैं। झाँसी की राणी सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्थान हैं। झाँसी की राणी लक्ष्मीबाई की वीरता का गाथा महान कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान – Subhadra Kumari Chauhan ने अपनी “झाँसी की रानी” – Jhansi Ki Rani इस कविता के जरिये बताने की कोशिश की आज हम उसी “झाँसी की रानी” को आपके लिए लाये हैं।

“झाँसी की रानी” कविता – Jhansi ki Rani Poem

सिंहासन हिल उठे राजवंषों ने भृकुटी तनी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सब ने मन में ठनी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, यह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।

कानपुर के नाना की मुह बोली बहन छब्बिली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वो संतान अकेली थी,
नाना के सॅंग पढ़ती थी वो नाना के सॅंग खेली थी
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी, उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथाएँ उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वो स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना यह थे उसके प्रिय खिलवाड़।
महाराष्‍ट्रा-कुल-देवी उसकी भी आराध्या भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ बन आई रानी लक्ष्मी बाई झाँसी में,
राजमहल में बाजी बधाई खुशियाँ छायी झाँसी में,
सुघत बुंडेलों की विरूदावली-सी वो आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।

उदित हुआ सौभाग्या, मुदित महलों में उजियली च्छाई,
किंतु कालगती चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई है, विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मारे राजाजी, रानी शोक-सामानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब …

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shayarisms4lovers June18 279 - सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायेँ | Subhadra Kumari Chauhan Poems

सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायेँ | Subhadra Kumari Chauhan Poems

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Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान हिन्दी भाषा की एक महान और प्रसिद्ध कवयित्री तथा लेखिका थीं। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सुंदर सुंदर रचनाएँ की उनकी प्रसिद्ध कविता “झाँसी की रानी” आपने हमारे पिछले पोस्ट में पढ़ी। यह कविता झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की गाथा बताती है इसी कविता के वजह से सुभद्रा कुमारी चौहान काफ़ी प्रसिद्ध हुयी। आज हम उन्ही की कुछ और कविताओं – Subhadra Kumari Chauhan Poems को पढेंगे। आशा हैं आपको बाकि की कविता भी जरुर पसंद आयेंगी।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कवितायेँ – Subhadra Kumari Chauhan Poems

Subhadra Kumari Chauhan Poems 1

“मेरा नया बचपन”

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी भी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया …

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