Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

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साल 1986 की बात है…

शादी के बाद, पहली बार हम अपनी श्रीमती जी को लिवाने “कानपुर धाम” पहुंचे…सूरत से ट्रेन के तीस घण्टे के लंबे सफर के बाद| ट्रेन कानपुर स्टेशन पर रुकते ही एक “कुली महाशय” हमारी सीट पर आकर बोले “पाय लागूं जीजाजी”…

इससे पहले कि हम समझ पाएं कि ये “लाल ड्रेस” वाले “साले साहब” हमारी शादी में क्यूँ नहीं दिखे, इतने में एक और नए “साले साहब” प्लेटफार्म पर उतरते ही चाय लेकर हाज़िर…

असल में हमारे “ओरिजिनल साले साहब” ने कुली से लेकर स्टॉल वाले को हमारे चेहरे मोहरे ,केबिन और सीट नंबर के साथ एक्स्ट्रा टिप दे के रक्खी थी कि “हमार जीजा आय रहे हैं , जरा ध्यान रखना समझे ???

इतने में हमारे “ओरिजिनल” साले साहब बाहें फैलाये चार पांच चेलों चपाटों के साथ प्रकट हुए , मुँह में पान मसाला दबाए लपके …”पाय लागे जीजाजी” कहते हुए की चारों तरफ “फ़िज़ा” में पान मसाले ,गुटके और केसरी तंबाकू की गंध भरी साँसें छा गईं …

स्टेशन से बाहर पैर रखते ही ड्राइवर लखन की “पिचकारी” और “पाय लागूं जीजाजी” से स्वागत हुआ…अब इतना सब होते-होते हमें अपनी उम्र पर शक़ होने लगा कि हम 26 के हैं या 62 के….

मगर ये तो अभी शुरुआत थी…

जॉइंट फैमिली भी माशाअल्लाह “डायनोसोर” जैसी ”जायंट” थी| घर पहुंचते ही दादी सास, सालियाँ ,भाभियाँ ,बुआ, मौसियाँ, बुज़ुर्ग महिलाएं, हर साइज़ के बच्चे बच्चियाँ और हमार सासु माँ दरवाज़े पर हाथ में आरती की थाली लिए स्वागत के लिए तैयार..

माथे पर एक भारी भरकम तिलक पर इतना केसर और चावल चिपकाय दिए गए कि ससुरी “टुंडे” की एक प्लेट “केसरी बिरयानी” बन जाये|

आख़िर बड़ी मुश्किल से सोफे पर बइठे ही थे कि ससुर जी आय गए …”हम फिर पाय लगे”…ससुराल का परिवार इतना बड़ा कि सदस्य “हनुमान जी की पूँछ” की तरह खत्म होने का नाम ही न लें…

पाँय लगने और लगवाने में ही हमार कमर दर्द करने लगी…अब इतने से भी मन न भरा तो हमारी पत्नी की कज़िन ने अपने नवजात शिशु को हमारे हाथों में थमाय दिया …

अले ले ले ले…जीजू आये जी…जू

लेकिन उस “समझदार” शिशु ने “नवजात” जीजू के रुतबे से प्रभावित होने से इनकार कर दिया और गोद में आते ही ज़ोर ज़ोर से प्रलाप करने लगा … इसलिए जल्दी मुक्ति मिल गई|

आखिर तीस घण्टे की यात्रा की थकान से त्रस्त हमने दूर खड़ी पत्नी …

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