भगवान श्री कृष्ण का अनोखा मंदिर श्रीनाथजी मंदिर | Shrinathji Temple

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Shrinathji Temple

महाभारत के नायक भगवान श्री कृष्ण के आज हर जगह पर मंदिर देखने को मिलते है। लेकिन एक ऐसी भी जगह जहापर भगवान श्री कृष्णा एक अलग रूप में दिखाई देते है। उस मंदिर के भगवान का जो रूप है, भगवान की जो मूर्ति है वह पूरी तरह से अलग है। इस मंदिर को श्रीनाथजी का मन्दिर – Shrinathji Temple कहते है।

यह मंदिर इसीलिए सबसे खास और विशेष है क्यों की इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण बाल अवतार में दिखाई देते है। भगवान बालक के रूप में इसीलिए है क्यों की उन्होंने बचपन में एक बार गोवर्धन पर्वत को अपने एक हाथ से उठाया था। तो उसी मुद्रा वाली मूर्ति इस श्रीनाथजी मंदिर में है। आज हम आपको राजस्थान के इसी श्रीनाथजी मंदिर की जानकारी देने जा रहे है।

भगवान श्री कृष्ण का अनोखा मंदिर श्रीनाथजी मंदिर – Shrinathji Temple

श्रीनाथजी भगवान श्री कृष्ण के अवतार है और यह भगवान श्रीनाथजी एक छोटेसे सात साल के बालक के अवतार में विराजमान है। भगवान श्रीनाथजी का मंदिर राजस्थान के नाथद्वारा शहर में स्थित है। यह मंदिर उदयपुर से उत्तर पूर्वी दिशा में 48 किमी की दुरी पर स्थित है।

भगवान श्रीनाथजी वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख देवता है और इस संप्रदाय को कुछ लोग पुष्टि मार्ग, वल्लभ संप्रदाय और शुद्धद्वैत नाम से भी जानते है और इस संप्रदाय की स्थापना वल्लभाचार्य ने की थी। भक्ति योग के अनुयायी और गुजरात और राजस्थान के वैष्णव प्रमुखता से श्रीनाथजी को मानते है और उनकी पूजा करते है। भाटिया लोग भी श्रीनाथजी के बड़े भक्त है।

वल्लभाचार्य के बेटे विट्ठल नाथजी भगवान श्रीनाथजी के बड़े भक्त थे और भगवान की निस्वार्थ रूप से सेवा और भक्ति करते थे। नाथद्वारा शहर में उन्होंने ही श्रीनाथजी की भक्ति को चरम सीमा पर पहुचाया था। इसकी वजह से नाथद्वारा के सभी लोग श्रीनाथजी की इतनी भक्ति करने लगे की कुछ समय बाद इस शहर को लोग श्रीनाथजी नाम से ही जानने लगे थे। इस शहर को कुछ लोग बावा की नगरी और श्रीनाथजी बावा की नगरी कहते है।

बचपन में भगवान श्री कृष्ण को देवदमन भी कहते थे क्यों की उन्होंने बचपन में ही गोवर्धन पर्वता को उठाया था जिसे इन्द्रदेव भी नहीं उठा सके थे। वल्लभाचार्य ने ही भगवान को गोपाल नाम दिया था और जिस जगह पर भगवान की पूजा की जाती है आज उस जगह को सभी गोपालपुर कहते। उसके बाद में विट्ठल नाथजी ने भगवान को श्रीनाथजी नाम दिया। यहापर …

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