अगर न बदलू तेरी खातिर हर एक चीज़ तो कहना – आलम इक़बाल की शायरी

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अगर न बदलू तेरी खातिर हर एक चीज़ तो कहना

मुहब्बत की तमना है तो फिर वो वस्फ पैदा कर
जहां से इश्क़ चलता है वहां तक नाम पैदा कर

अगर सचा है इश्क़ में तू ऐ बानी आदम
निग़ाह -ऐ -इश्क़ पैदा कर

मैं तुझ को तुझसे ज़्यादा चाहूँगा
मगर शर्त ये है के अपने अंदर जुस्तजू तो पैदा कर

अगर न बदलू तेरी खातिर हर एक चीज़ तो कहना
तू अपने आप में पहले अंदाज़ -ऐ -वफ़ा तो पैदा कर

Agar Na Badlu Teri Khatir Har Ek Cheez To Kehna

Muhabbt Ki Tamna Hai To Phir Wo Vasf Peda Kar
Jahan Se Ishq Chalta Hai Wahan Tak Naaam Peda Kar

Agar Sacha Hai Ishq Mein Tu Ae Bani ADAM
Nighah-E-Ishq Peda Kar

Main Tujh Ko Tujh Se Ziada Chahunga
Magar Shart Yeh Hai Ki Apne Andar Justju To Pedaa Kar

Agar Na Badlu Teri Khatir Har Ek Cheez To Kehna
Tu Apne Aap Mein Pehle ANDAAZ-AE-Wafa To Paida Kar

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