आत्मज्ञान का संगीत Hindi inspirational story

आत्मज्ञान का संगीत Hindi inspirational story

रानी पद्मीनी ने आज गुरु दीक्षा ली है। पद्मीनी ने सांसारिक मोह माया को त्याग करने का व्रत धारण किया , जिसके कारण वह गरीबों में सुबह से दान – पुण्य का काम कर रही है।  रानी पद्मीनी को इससे पूर्व ऐसा अभूतपूर्व आभास नहीं हुआ था , जैसा आज दान – पुण्य करके हो रहा था।

रानी पद्मीनी थक – हारकर रात्रि के विश्राम के लिए गई , पद्मिनी के कान में एक दिव्य संगीत सुनाई पड़ी। इस संगीत की ध्वनियाँ इतनी कोमल और चित्ताकर्षक थी कि रानी पद्मीनी उस ध्वनि की ओर जाने से अपने आप को रोक नहीं पायी। रानी पद्मिनी ध्वनि का पीछा करते करते एक नदी के तट पर पहुंची।

रानी पद्मीनी को आभास हुआ यह कोमल ध्वनि नदी के उस पार से आ रही है। आसपास देखा एक नाव , नदी के तट पर बंधी हुई थी।  मल्लाह नाव में ही रात्रि विश्राम कर रहा था। रानी पद्मिनी ने मल्लाह को जगाया और नदी पार करवाने के लिए आग्रह किया।

मल्लाह ने यह कहते हुए नदी पार करने से इंकार कर दिया कि – ” अभी नदी पार करना उचित नहीं है , हवा तेज चल रही है। ”

रानी पद्मिनी ने अपना परिचय बताया – तुम जानते नहीं हो मैं कौन हूं ?

मैं रानी पद्मीनी हूं !

मल्लाह –  ” महारानी क्षमा करें ! तब तो नदी पार कराना और भी अनुचित होगा , क्योंकि आप रानी है और इस समय खतरा अधिक है।

रानी पद्मिनी की क्रोधाग्नि भड़की , किंतु रानी पद्मिनी ने धैर्य पूर्वक पुनः आग्रह किया।

भाई मल्लाह जो तुझे इनाम चाहिए वह मैं दे सकती हूं , तू मुझे नदी पार करा दे।

मल्लाह आप क्या दे सकती हैं ?

रानी पद्मिनी ने तत्काल अपने गले से रत्न जड़ित माला उतार कर मल्लाह को देते हुए कहा इससे तेरी सात पुस्ते घर बैठे खाएंगी।

मल्लाह  –  मगर यह मेरे किसी काम का नहीं , मैं इसको कहां रखूंगा ? हर समय चोरी का खतरा बना रहेगा।

रानी पद्मीनी –  मैं तुझे अपना संगमरमर से निर्मित महल दे दूंगी , जिसे देख पाना भी सभी लोगों के लिए नामुमकिन है।

मल्लाह  –  मैं इतने बड़े महल का क्या करूंगा ? यह मेरे किस काम की नहीं। मेरी कुटिया में हम लोग सभी एक साथ रहते हैं , महल में सब अलग – अलग रहेंगे। पेड़ – पौधों को पानी कौन देगा ? बगीचा सुख जाएगा , सभी पशु – पक्षी वहां से पलायन कर जाएंगे विरान में सियार रोएंगे यह महल मेरे किसी काम का नहीं।
रानी पद्मिनी गुस्से से तमतमा ते हुए –  ” जो मैं कुछ देती हूं वह तो स्वीकार नहीं करता , खुद कुछ मांगता नहीं। ”

वह दिव्य संगीत धीरे – धीरे रानी पद्मिनी के और करीब आता गया , ऐसा लग रहा था कि वह संगीत का स्रोत कहीं आस-पास ही है।

रानी पद्मिनी इस संगीत से व्याकुल उसके स्रोत को ढूंढना चाह रही थी। रानी पद्मिनी संगीत के लिए भाव विहल होती जा रही थी।  रानी पद्मिनी ने मांझी से कहा मांझी मुझे नदी पार करा दे –

मैं तेरे लिए जीवन भर दासी बनी रहूंगी

तेरी मॉँझिन के पैर में मलूंगी

तेरे झोपड़ी को फूलों से भर दूंगी

तेरे रास्तों में पुष्प वर्षा करूंगी

ज्यों -ज्यों दिव्य संगीत की प्राण पोषणी ध्वनि उसके निकट आती जा रही थी , वह व्याकुल होती जा रही थी। अंततः वह विक्षिप्त अवस्था में पहुंच गई और मांझी के पैरों में गिर गई।

यह दिव्य संगीत रानी पद्मिनी के मुख मंडल से निकल रही थी , यह उसके आत्मा की संगीत थी जिसके कारण उसका मुख मंडल चंद्रमा के समान दिव्य आभा दे रही थी ।

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