आख़िर दिल्ली को ही भारत की राजधानी क्यों बनाया गया?

Capital of India

Capital of India – भारत की राजधानी दिल्ली का रंगीन मिजाज, इसकी चाकचौंध और आधुनिकता के बीच इतिहास की झलक इसे आज भी देश के दूसरे राज्यों से कहीं अलग बनाती है। दिल्ली को भारत की राजधानी बने 100 सौ साल से ज्यादा हो चुके है। और इन 100 सालों में दिल्ली में बहुत कुछ बदला। दिल्ली से पहले भारत की राजधानी कोलकत्ता हुआ करती थी। लेकिन 12 दिसंबर साल 1911 को दिल्ली में आयोजित एक दरबार में जॉर्ज पंचम ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा की।

हालांकि दिल्ली को भारत की राजधानी 12 फरवरी साल 1931 में बनाया गया। और तभी से शुरु हुआ दिल्ली देश की राजधानी के रुप में एक अनोखा सबक। दिल्ली इन ये जानना जरुरी है कि दिल्ली को भारत की राजधानी क्यों बनाया गया था।

आख़िर दिल्ली को ही भारत की राजधानी क्यों बनाया गया – Why Delhi was made the Capital of India

दरअसल कोलकत्ता पहले भारत की राजधानी हुआ करती थी। लेकिन अंग्रजों ने अपने अध्ययन में पाया कि लोगों के लिए कोलकत्ता से ज्यादा दिल्ली का महत्व था। जो भी आवाज उठती, उसका मुख्य केंद्र दिल्ली होता। इसके अलावा पुरानी दिल्ली की शान शौकात, खान – पान सभी पूरे भारत में मशहूर थे।

दिल्ली लोगों में एक अलग लोकप्रयिता हुआ करती थी। वहीं दूसरी तरफ कोलकत्ता में तनाव बढ़ता ही जा रहा था। जिस वजह से जॉर्ज पंचम ने दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की।

जिसके लिए दिल्ली में एक दरबार लगाया गया। जिसमें उन्होनें 80 हजार लोगों के सामाने इस बात की घोषणा की। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि जब आप इतिहास के पन्नों को पलटते है तो देखते है कि महाभारत मे पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ जो कि दिल्ली का पुराना नाम है, से लेकर पृथ्वीराज चौहान, मोहम्मद गौरी, अलाउद्दीन खिलजी और फिर मुगलों की सत्ता का मुख्य केंद्र हमेशा से दिल्ली ही रही। जिसने इस शहर के महत्त्व को ओर भी बढ़ा दिया।

100 साल में कितनी बदली दिल्ली

दिल्ली का राजधानी के रुप में सफर 1931 से शुरु हुआ। इस दौरान दिल्ली सबसे पहले आजादी का हिस्सा बनी साल 1947 मे 15 अगस्त के दिन दिल्ली के लाल किले पर झण्डा फहराकर देश को आजाद देश घोषित किया गया। फिर इसके बाद भारत – पाक बंटवारे की आग भी यही से शुरु हुई। बंटवारे के बाद हजारों शर्णार्थी दिल्ली आए जिन्होनें दिल्ली को अपना – अपना रंग दिया।

लाहौर और पाकिस्तान के पंजाब से आए लोगों ने दिल्ली में खारी बावड़ी जो कि आज के समय में एशिया की सबसे बड़ी होलसेल मसाला मार्केट है और घरेलु समान की सबसे बड़ी थोक बाजार सदर बाजार को बसाया। जो आज पूरे देश में समान सप्लाई करती है। आजादी के बाद समय – समय पर देश के हित में उठने वाली हर आवाज दिल्ली से ही गुजरी। जिस वजह से दिल्ली ने अनशन भी देखा, हिंसक प्रदर्शन भी देखा, महिलाओं के हित में उठने वाली आवाज भी देखी तो आपतकाल भी दिल्ली ने ही सबसे पहले देखा था। जिसने दिल्ली वालों के जीवन पर भी गहरा असर डाला।

दिल्ली आज राजनीतिक की दृष्टि से ही नहीं स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार सभी की दृष्टि से सबसे अहम है यही कारण है कि आज दूसरे राज्यों से लोग यहां शिक्षा और स्वास्थय सेवाओं के लिए आते है। कभी गालिब की शायरियों मे डूबी रहने वाली दिल्ली की नाइट लाइफ आज के समय में बेहतरीन पब्स, डिस्क और रेंस्टोरेंट की शानदार सर्विस के लिए जानी जाती है।

क्या नहीं बदला

दिल्ली ने आधुनिकता को बड़ी खूबी अपनाया। लेकिन जो दिल्ली में नहीं बदला वो थी इस शहर का इतिहास। आज के समय अगर हम दिल्ली को देखे तो दिल्ली दो भागों बंटी नजर आती है एक वो दिल्ली जिस पर रजवाड़ो से लेकर मुगलों तक झलक नजर आती है यानी कि पुरानी दिल्ली। यहां पर आज भी लजीज मुगलाई खान – पान काफी मशुहर है वहीं दूसरी तरफ नई दिल्ली जिसे अंग्रेजों ने बसाया था। और शायद यही दिल्ली की खासियत भी है कि दिल्ली वक्त के साथ बदलती भी है लेकिन अपने अस्तित्व कोई भी नहीं भुलती है।