इश्क़ और जनून – शायरी

इश्क़ और जनून
 

दौर था इश्क़ का और हम बह गए
भरोसा हम गैरों पर कर गए
न फ़िक्र अंजाम की हम दुश्मन जमाना कर गए
होश तब आया जब भरी महफ़िल में तन्हां हम रह गए


जो अँधेरे मैं गुम है वो साया कौन है
 

तेरी आँख मैं वो शख़्श कौन है
तेरे चेहरे का यह रंग कौन है
जो अँधेरे मैं गुम है वो साया कौन है..


मैं तो दीवाना हूँ उस की रूह -ओ -रुख़्सार का
 

न जाने यह लोग क्या ढूंढ रहे है
बहुत जाना पर न जाने क्या ढूंढ रहे है
मैं तो दीवाना हूँ उस की रूह -ओ -रुख़्सार का
न जाने यह लोग मुझमे क्या ढूंढ रहे है..

Meri Diwangi
 

na jane yeah log kya doodnd rahe hai
bahut jana par na jane kya doond rahe hai
main to diwana hoon us ki rooh-he-ruksar ka
na jane yeah log mujme kya doond rahe hai..


Wo Shaksh Kaun Hai
 

Teri ankh main wo shaksh kaun hai
tere chehre ka yeah rang kaun hai
jo andhre main gum hai wo saya kaun hai..


Ishq Ka Daur
 

daur tha ishq ka aur hum beh gaye
bharosa hum gairon par kar gaye
Naa fikar anjam ki hum dusman jamana kar gaye
hosh tab aya jab bhari mehfil mai tanha hum reh gaye

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