कली का फूल बनना और बिखर जाना मुक़दर है

तुम ही को चाहते है तुम ही से प्यार करते है
यही बरसो से आदत है और आदत कब बदलती है

तुम को जो याद रखा है यही अपनी इबादत है
इबादत जिस तरह की हो इबादत कब बदलती है

कली का फूल बनना और बिखर जाना मुक़दर है
यही कानून-ऐ-फितरत है और फितरत कब बदलती है

जो दिल ही नक़्श कर जाये निगाहों में सिमट आये
अलामत है यह चाहत की तो चाहत कब बदलती है

पुराने ज़ख़्म को अक्सर भुला देना ही अच्छा है
न चाहे आप ही कोई तो क़िस्मत कब बदलती है

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