गुरुपौर्णिमा पर भाषण | Guru purnima Speech

Guru purnima Speech

“गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥”

भारत के स्कूल, कॉलेज और विद्यापीठो में गुरु पौर्णिमा जैसा पवित्र त्यौहार बड़े उल्हास के साथ मनाया जाता है। गुरु पौर्णिमा धार्मिक और सामाजिक तौर पर मनाया जानेवाला त्यौहार है। हिन्दू धर्मं में ब्रह्मदेव, विष्णु और भगवान शिव की पूजा की जाती है उसी तरह शिक्षक भी समाज की सेवा करते इसीलिए समाज भी उनके प्रति कृतज्ञ है।

गुरुपौर्णिमा पर भाषण – Guru purnima Speech

इसका मतलब यह भी निकलता है की जिस तरह हम भगवान की प्रार्थना करते है, उनकी पूजा करते है ठीक उसी तरह का सम्मान समाज के शिक्षक को दिया जाता है। गुरु पौर्णिमा मौके पर स्कूल और कॉलेज में भाषण दिए जाते है और कई जगहों पर छात्रों के लिए निबंध प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।

इसीलिए यहाँ पर दी गयी गुरु पौर्णिमा की सारी जानकारी और उसका महत्व ध्यान से पढ़िए। क्यों की जब भी आप गुरु पौर्णिमा विषय पर भाषण देने की सोचेंगे तो यहाँ की जानकारी आपको मदत करेगी और आप किसी के भी सामने अच्छेसे भाषण दे पाएंगे।

गुरुपौर्णिमा भारत का एक पारंपरिक और सांस्कृतिक त्यौहार है जिसे हमारे देश में व्यास पौर्णिमा नाम से जाना जाता है। हमारा ऐसा देश है जहा गुरु को भगवान माना जाता है। इसी दिन को सभी शिक्षको के लिए मनाया जाता है और इसी दिन वेद व्यास का जन्म भी हुआ था जिन्होंने चारो वेदों की निर्मिती की थी। इसीलिए भी गुरु पौर्णिमा को व्यास पौर्णिमा और व्यास जयंती भी कहा जाता है।

आषाढ़ महीने के पौर्णिमा के दिन गुरु पौर्णिमा मनाई जाती है और यह त्यौहार हर बार जून जुलाई महीने के बिच में मनाया जाता है। गुरु संस्कृत शब्द है और इसमें का ‘गु’ का मतलब होता है की अँधेरा और ‘रु’का अर्थ होता है दूर करनेवाला। यानि जो इन्सान हमारे जीवन में से अँधेरे को हटा देता है, और उजाला लेकर आता है उसे गुरु कहा जाता है।

मिटटी जब गीली होती है तभी उसे देखकर कोई बता नहीं सकता की उससे क्या बन सकता है। अगर उस मिटटी का सही तरह से इस्तेमाल ना किया जाए तो वह कुछ भी काम की नहीं होती। उसका समाज में कोई महत्व नहीं होता। वह केवल मिटटी ही रह जाती है और केवल लोगो के पैरों के निचे कुचली जाती है।

मगर जब कोई कुम्हार उस मिटटी को गिला करके उसे अपने हातो से कोई आकार देता है तो वही मिटटी एक मटके का रूप लेती है और समय आने पर किसी प्यासे इन्सान की प्यास बुझाने के लिए काम आती है। ठीक उसी तरह का काम हमारे जीवन में गुरु का होता है।

अगर हमारे जीवन में गुरु नहीं तो हमारी जिंदगी कुछ काम की नहीं रहती है। हम अपने जीवन में कुछ भी नहीं बन सकते। लेकिन अगर गुरु मिल जाए तो हमारा जीवन सफल होता है। वह हमें अपने जीवन में हर मोड़पर मार्गदर्शन करता। उसके मार्गदर्शन से हम अपने लक्ष्य तक पहुच सकते है। गुरु ही हमें जिंदगी की हर चुनौती का सामना करना सिखाता है। गुरु की वजह से ही हम एक काबिल इन्सान बन सकते है और समाज के लिए कुछ बेहतर दे सकते है। इसी गुरु की महिमा का वर्णन निचे दिया गया है।

गुरु पौर्णिमा को एक अध्यात्मिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। गुरु हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित करते है क्यों की जब भी हम निराश हो उस समय हम खुद को चुनौती दे सके और जीवन में आगे बढ़ सके।

कोई भी गुरु अपने शिष्य को उसके उद्देश्य को पुरा करने के लिए मदत नहीं करता लेकिन जो सच्चा गुरु होता है वह हमेशा अपने शिष्य का मार्गदर्शन करता है, उसे उसके उद्देश्य में सफल बनाने के लिए हर तरह की कोशिश करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह की वह हमेशा अपने शिष्य का साथ देता है।

गुरु हमें अपने लक्ष्य तक पहुचने के लिए मार्गदर्शन करता है और जबतक हम अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर लेते तब तक वह हमारा मार्गदर्शन करता रहता है। कोई साधू या कोई धार्मिक व्यक्ति या कोई पुजारी हमारा गुरु नहीं हो सकता। सच्चा गुरु वह होता है जो हमें कामयाब होने के लिए अपना समय दे सके हमारी हर हालत में मदत कर सके। हमारे सच्चे गुरु कौन होते है उनकी जानकारी निचे दी गयी है।

हमारे माता पिता हमारे पहले गुरु होते है जो हमें बचपन से ही सिखाना शुरू कर देते है। वह हमें बचपन से प्यार करना सिखाते है। वह हमारे बचपन के गुरु होते है और वही हमारी आखिरी तक सहायता करते रहते है और हमें अपने लक्ष्य तक पहुचाने में हर तरह की कोशिश करते है।

स्कूल में जो शिक्षक हमें पढ़ाते है वह हमारे दुसरे गुरु होते है वह हमें समाज और उसकी संस्कृति के बारे में सभी बाते समझाकर बताते है। गणित, विज्ञान, इतिहास सिखाने का काम केवल शिक्षक ही कर सकते है। समाज में रहने के लिए इन सब बातो का जानना बहुत जरुरी होता है। शिक्षक हम में नैतिकता को विकसित करने में काफी मदत करते है जिसकी वजह से हमें भविष्य में बहुत सारे फायदे होते है।

लेकिन कुछ उम्र गुजरने के बाद माता पिता और शिक्षक हमें प्रभावित नहीं कर सकते वह हमारी सोच को बदल नहीं सकते। लेकिन यह सब हमारा मित्र जरुर कर सकता है। हमारा मित्र चाहे कितना भी बुद्धिमान क्यों ना हो लेकिन वह हमारा दोस्त होने की वजह से वह हमारी मदत करता है और हमें हमेशा अच्छे काम करने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसीलिए वह भी एक तरह से हमारा गुरु होता है। युवावस्था के बाद शादी हो जाती है तो उसके बाद पति पत्नी भी एक दुसरे के गुरु बन सकते है।

इसका मतलब यह है की हर किसी के जीवन में कई सारे गुरु होते है और समय के साथ साथ गुरु के रूप बदलते रहते है। कोई भी ऐसा गुरु नहीं की वह जन्म से लेकर मरने तक हमारे साथ रह सके और हमारी मदत कर सके इसीलिए हमने खुद का भी गुरु होना चाहिए।

बहुत पुराने समय से हमारे देश में गुरु शिष्य के रिश्ते को बड़ा उचा स्थान दिया जाता है। वाल्मीकि, वेद व्यास, द्रोणाचार्य जैसे महान गुरु भारत जैसे पवित्र भूमि में जन्म ले चुके है। अर्जुन, एकलव्य जैसे पराक्रमी शिष्य केवल महान गुरु के मार्गदर्शन के कारण ही बन सके। गुरु पौर्णिमा के दिन सभी वेद व्यास जयंती मनाते है क्यों की इसी दिन वेद व्यास का जन्म हुआ था। महाभारत में वेद व्यास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने ही हिन्दू धर्म के चारो वेदों की निर्मिती की थी।

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