तन्मयता बिना सृजन नहीं : गुरू रविंद्रनाथ टैगोर का प्रेरक प्रसंग

फ्रेंड्स, इस पोस्ट में हम गुरू रविंद्रनाथ टैगोर का एक प्रेरक प्रसंग (Tanmayta Ravindra Nath Tagore Prerak Prasang) शेयर कर रहे हैं. गुरू रविंद्रनाथ टैगोर विश्व प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार, दार्शनिक थे. भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ उनकी ही रचना है. बांग्ला देश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उनकी ही लेखनी से सृजित हुआ है.

Tanmayta Ravindra Nath Tagore Prerak Prasang

यह प्रेरक प्रसंग उनके जीवन के उस घटनाक्रम का वर्णन करता है, जो दर्शाता है कि वे कला के प्रति कितने समर्पित थे और कितनी तन्मयता से कार्य किया करते थे. पढ़िए यह प्रेरक प्रसंग : 

 

एक दिन की बात है. शांति निकेतन के अपने कक्ष में गुरू रविंद्रनाथ टैगोर कविता लिख रहे थे. कविता लिखने में वे इतने तल्लीन थे कि उन्हें आभास ही नहीं हुआ कि कोई इनके कक्ष में दबे पांव प्रवेश कर गया है.

वह एक डाकू था, जो गुरूजी की हत्या के उद्देश्य से आया था. निकट पहुँचकर वह तेज आवाज़ में बोला, “आज मैं तेरी प्राण लीला समाप्त करके ही जाऊंगा.”

 

डाकू की आवाज़ सुनकर गुरूजी का ध्यान उस ओर गया. देखा, बगल में डाकू हाथ में चाकू लिए खड़ा है और उन पर वार की ताक में है. वे बोले, “तनिक ठहरो, एक सुंदर भाव उत्पन्न हुआ है. उसे मैं कविता में उतार लूं. उसके बाद तुम मुझे मार देना. मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा. आनंदपूर्वक अपने प्राण दे दूंगा.”

इतना कह वे पुनः कविता लिखने में तल्लीन हो गए. डाकू उन्हें हतप्रभ सा देखता रह गया. इधर गुरूजी कविता में ऐसे तल्लीन हुए कि उन्हें भान ही नहीं रहा कि बगल में उनकी हत्या के प्रयोजन से आया डाकू खड़ा है.

जब कविता पूर्ण हुई, तो उन्हें डाकू का ख़याल आया. उसकी ओर देख वे बोले, “विलंब के लिए क्षमा. कविता लिखने की तल्लीनता में मैं तुम्हारे बारे में भूल ही गया. अब तुम अपना प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं. मैं अपने प्राण देने तत्पर हूँ.”

गुरूजी ने इतना कहा कि डाकू उनके चरणों में गिर पड़ा. उसकी आँखों से आँसू बहने लगे. इतने सौम्य चित्त और कला के प्रति समर्पित व्यक्ति से उसकी कभी भेंट ही नहीं हुई थी. उसने गुरूजी की हत्या का विचार त्याग दिया और चाकू फेंक उनसे क्षमायाचना करने लगा.

इस प्रकार गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर पूर्ण तन्मयता से कार्य किया करते थे. बिना तन्मयता के सृजन असंभव है. इसलिए जब भी आप किसी कार्य में जुटे, तो पूरी तल्लीनता से जुटें, कार्य अवश्य सिद्ध होगा.