“थ्री इडियट्स” के जैसे तीन दोस्तों की कहानी – 3 Friends Story Like 3 Idiots Movie

3 Friends Story Like 3 Idiots Movie

हमारी जिन्दगी भी किसी फिल्म से कम नहीं होती है बल्कि यूं कहे की पूरी की जिन्दगी एक फिल्म होती है। ऐसी फिल्म जिसमे अंत में सब बेहतर होता है लेकिन शुरुआत बड़ी मुश्किल होती है। कई सारी जिन्दगिया होती है जिनकी कहानी देखने के बाद लगता है की ये फ़िल्मी स्टोरी है और ऐसी ही कहानी है तीन दोस्तों की जो की फिल्म थ्री इडियट्स से मिलती जुलती है।

जिस तरह से उसमे दोस्त सफल होकर मिलने का वादा करते है उसी तरह से इसमें भी तीन दोस्त सफल होकर मिलने का वादा करते है और निकल पड़ते है अपनी मंजिल की तरफ और दस साल बाद मिलते है अपने अपने जिन्दगी में सफलता लेकर।

“थ्री इडियट्स” के जैसे तीन दोस्तों की कहानी – 3 Friends Story Like 3 Idiots Movie

ये कहानी है आईएस निशांत जैन  (Nishant Jain) , लेखक सुमित अरोड़ा (Sumit Arora ) और कार्टूनिस्ट वतन सिंह (Vatan Singh) की। निशांत आज आईएस है और उन्होंने 13वीं रैंक हासिल की है, सुमित आज बॉलीवुड फिल्मो में राइटर है और वतन सिंह आज हिंदी के एक बड़े न्यूज़ चैनल में सीनियर कार्टूनिस्ट है।

मेरठ की गलियों से शुरुआत- तीनो दोस्त निशांत, वतन और सुमित मेरठ शहर के रहने वाले है। तीनो के जीवन में सबसे बड़ी कामन बात थी की इनके घर में कतई पैसे नहीं थे। बस गुजारा चल रहा था कैसे भी और फिर भी इनके सपने बहुत बड़े थे। शुरुआती पढ़ाई मेरठ के सरकारी स्कूल से हुई।

लेकिन कहते है ना की पूत के पाँव पालने में ही नजर आने लगते है और ऐसा था इनके साथ। सुमित और निशांत को लेखन का का शौक चढने लगा और वतन सिंह कार्टून बनाने में मजा लेते थे। सुमित को गद्य बहुत पसंद था तो निशांत को कविताये और वतन को व्य्वाग में बड़ी रूचि थी।

इनके घर में इतने पैसे नहीं थे की ये लोग जाकर अपने अपने फील्ड के बड़े इंस्टिट्यूट में दाखिला और अपना कैरियर बनाये। कई सारे छोटे मोटे काम करके खुद का खर्चा चलाने लगे। दसवी में तीनो फर्स्ट डिविसन उत्तीर्ण हुए और इसके बाद बारहवीं में भी अच्छे नम्बर लाये।

अब तक सुमित बढ़िया लिखने लगे थे और वतन सिंह के कार्टून भी लोकल अखबारों में प्रकाशित होने लगे थे तो वही निशांत देश की सेवा करने के लिए आईएस का ख्वाब अपने मन में संजोने लगे थे।

तीनो दोस्तों ने अलग अलग राहें पकड़ी। सुमित मुबई चले गए, वतन सिंह अखबारों की दुनिया में और निशान ग्रेजुएशन करने लगे। वतन सिंह ने काफी समय तक मेरठ के बड़े अख़बार में कार्टूनिस्ट का काम किया और कई बार बड़े चैनल्स में जाने की कोशिश की लेकिन चांस नहीं मिला।

इसके बाद आखिर में उन्हें भारत के बड़े न्यूज़ चैनल्स में एक न्यूज़18 से बुलावा आया और आज वो सीनियर कार्टूनिस्ट के तौर पर काम करते है। तो वही सुमित मुंबई चले गए और लेखन में अपना भाग्य आजमाने लगे। सुमित ने छोटे परदे से शुरुआत की और सास-बहु जैसे सीरियल्स में जमकर डायलाग लिखे और इसके बाद थिलर भी लिखे।

इसके बाद उनकी पहचान बढने लगी और उन्होंने आल इज वेल फिल्म लिखी जो की कुछ ख़ास नहीं चली लेकिन सुमित का हाथ लेखन में जम गया और मुंबई में उनके कदम भी। इसके बाद उनकी जिन्दगी में मोड़ आया साल 2018 में जब उन्होंने स्त्री फिल्म के डायलाग लिखे।

उनकी लिखी फिल्म स्त्री सौ करोड़ की कमाई वाले क्लब में शामिल हुई। अब वो कई सारी फिल्मे लिख रहे है। तीस साल के सुमित अब बॉलीवुड में अपना कदम पूरी तरह से जमा चुके है।

जब सुमित ने मुंबई का रुख किया तो निशांत ने ग्रेजुएशन किया और पोस्टल विभाग में नौकरी करने लगे लेकिन मन नहीं भर रहा था। इसके बाद नेट की परीक्षा पास की और एम.ए भी किया। इसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम.फिल के लिए बुलावा आया तो वहां पढने चले गए।

इसके बाद एक साल आईएस की तैयारी की लेकिन सफल नहीं हुए तो संसद भवन में ट्रांसलेटर बन गए। दूसरी बार कोशिश की और 13वीं रैंक लेकर आईएस बने और देशभर के सबसे बेहतर आईएस में गिने जाते है।

आज ये तीनो दोस्त ख़ुशी से मिलते है। तीनो अपने अपने क्षेत्र के माहिर खिलाडी है। सबसे बड़ी बात की तीनो की प्रेरणा हमेशा एक दूसरे ही रहे। सुमित कहते है की उन्होंने हमेशा ही निशांत से प्रेरणा ली और आगे बढ़ते रहे। इनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है बस ये फ़िल्मी परदे में रिलीज ना होकर असल जीवन के परदे में बनी है।

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