मुहब्बत भी तिजारत हो गयी है इस ज़माने में – Sahir Ludhianvi

कोई इलज़ाम
 

यह हुस्न तेरा यह इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इलज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इलज़ाम सही

Koi ilzaam
 

yeh husn teraa yeh ishq mera
rangeen to hai badnaam sahi
mujh par to kai ilzaam lage
tujh par bhi koi ilzaam sahi..


फ़िज़ायों के इशारे
 

नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही है
खामोश फ़िज़ायों के इशारे भी वही है
कहने को तो सब कुछ है मगर कुछ भी नहीं है

Fizayoon Kay Ishaare
 

Nazrein Bhi Wohi Aur Nazaare Bhi Wahi Hai
Khamoosh Fizayoon Kay Ishaare Bhi Wahi Hai
Kahne Ko To Sab Kuch Hai Magar Kuch Bhi Nahien Hai..


मुहब्बत भी तिजारत
 

भरम् तेरी वफाओं का मिटा देते तो क्या होता
तेरे चहरे से हम पर्दा उठा देते तो क्या होता
मुहब्बत भी तिजारत हो गयी है इस ज़माने में
अगर यह राज़ दुनिया को बता देते तो क्या होता
तेरी उम्मीद पर जीने से हासिल कुछ नहीं लेकिन
अगर यूं न दिल को आसरा देते तो क्या होता

Mohabbat bhi Tijaarat
 

bharam teri wafaon ka mita dete to kya hota
tere chehare se hum parda utha dete to kya hota
muhabbat bhi tijaarat ho gayi hai is zamaane mein
agar yeh raaz duniya ko bata dete to kya hota
teri umid par jine se haasil kuch nahin lekin
agar yoon na dil ko aasaraa dete to kyaa hotaa

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