यह जरूरी तो नहीं – इश्क़-ऐ-गम

उम्र जलवो में बसर हो
यह जरूरी तो नहीं

हर शबे-ऐ-गम की सेहर हो
यह जरूरी तो नहीं

नींद तो दर्द के बिस्तर पर भी आ जाती है
उसके आगोश में सर हो
यह जरूरी तो नहीं

आग को खेल पतंगों ने समझ रखा है
सब को अंजाम का डर  हो
यह जरूरी तो नहीं

वो करता है जो मस्जिद में खुदा को सजदे
उसके सजदों में असर हो
यह जरूरी तो नहीं

सब की शाकी पे नज़र हो
यह जरूरी है मगर
सब पे शाकी की नज़र हो
यह जरूरी तो नहीं


शायरी तो वो शक्श लिखते है
 

यह शायरी लिखना उनका काम नहीं
जिनके दिल आँखों में बसा करते है
शायरी तो वो शक्श लिखते है
जो शराब से नहीं , दर्द का नशा करते है


मिट गयी उम्मीद किसी की
 

शिकवा किसी का न फ़रियाद किसी की
होनी थी यूँही जिंदगी बर्बाद किसी की
एहसास मिटा, तलाश मिटी,मिट गयी उम्मीद किसी की
सब मिट गए ,पर न मिटा सके, याद उसकी


कहा था मोहबत करो
 

क्यों कोसते है मोहबत को हर बार लोग
क्या मोहबत के कहा था मोहबत करो

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