शायरी – एक मुसाफिर अजनबी

मुसाफिर के रास्ते बदलते रहे

मुसाफिर के रास्ते बदलते रहे , मुक़द्दर में चलना था चलते रहे
मेरे रास्तों में उजाला रहा , दीये उसकी आँखों में जलते रहे

कोई फूल सा हाथ कंधे पे था , मेरे पाओं शोलों पे चलते रहे
सुना है उन्हें भी हवा लग गयी , हवाओं के जो रुख बदलते रहे

वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया , मगर उम्र भर हाथ मलते रहे
मोहब्बत , अदावत , वफ़ा , बेरुखी , किराये के घर थे बदलते रहे
लिपट कर चिराग़ों से वो सो गए , जो फूलों पे करवट बदलते रहे..


मुसाफिर के साथ तू ने क्या किया

इस राह -ऐ -उल्फत के मुसाफिर के साथ तू ने क्या किया
कभी अपना लिया कभी ठुकरा दिया

मेरी मोहब्बत तेरे नाम का मुहाल तो नहीं
कभी बना लिया कभी गिरा दिया

मैं तेरी किताब -ऐ -ज़िंदगी का वो हर्फ तो नहीं हूँ जिसे
कभी लिख लिया कभी मिटा दिया

मेरा साथ तेरे लिए बाईस-इ-रुस्वाई तू नहीं जिसे
कभी दुनिया को बतला दिया कभी छुपा लिया

आज कल लोगों का यही मशग़ला है “मुसाफिर”
कभी हमें सोच लिया तो कभी भुला दिया..


ऐ मुसाफिर

दुनिया के ऐ मुसाफिर मंज़िल तेरी कब्र है
और जिस सफर पर तू चला है , दो दिन का वो सफर है..


अजनबी मुसाफिर

अजनबी राहों के अजनबी मुसाफिर
आ कर मुझसे पूछ बैठा है रास्ता बता दो गे

अजनबी राहों के , अजनबी मुसाफिर सुन
रास्ता कोई भी हो , मंज़िले नहीं मिलती

मंज़िलें तो धोखा हैं , मंज़िलें जो मिल जायें
जुस्तुजू नहीं रहती , ज़िन्दगी को जीने की आरज़ू नहीं रहती ..


एक गुमनाम मुसाफिर

एक गुमनाम मुसाफिर की तरह चुपके से
खुद को इस भीड़ में खो देने को जी चाहता है

इक इरादा ख़ाक की हर दुःख से दिला देगी निजात
खुद को मट्टी में समा देने को जी चाहता है

दर्द ऐसा है के मरहम की बजाए ‘मुसाफिर’
दिल में निश्तर सा चुभो देने को जी चाहता है..


मुसाफिर घर का रास्ता भूल गया

दर बेदर फिरा मुसाफिर घर का रास्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया

कैसे दिन थे कैसी रातें कैसी बातें बीत गयी
मन बालक है पहले पियार का सुन्दर सपना भूल गया

याद के फेर में आकर दिल पर ऐसी फिर एक चोट लगी
दुःख में सुख है सुख में दुःख है भेद यह करना भूल गया

एक नज़र की एक ही पल की बात है सारी साँसों की
एक नज़र का नूर मिटा जब हर पल बीता भूल गया

सूझ बूझ की बात नहीं मन मोजी है मस्ताना है
लहर लहर से जा सर टकराया सागर गहरा भूल गया

अपनी बीती जगबीती है जब से दिल ने जान लिया
हँसते हँसते जीवन बीता रोना धोना भूल गया

जिसको देखो उसके दिल में शिकवा है तो इतना है
हमें तो सब कुछ याद रहा पर हमको ज़माना भूल गया

कोई कहे यह किस ने कहा था कह दो जो कुछ जी  में  है
मेरा जी कह कर पछताया और फिर कहना भूल गया …


असीं मुसाफिर दो पल दे
 

असीं मुसाफिर दो पल दे , पानी वांग वह जाना
असीं वांग फूला पतझड़ विच झड़ जाना
की होया यह तंग करदे आ तेनु
इक दिन तेनु बिन दस्स्याँ ही तुर जाना…


कश्ती के मुसाफिर

आँखों मैं रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा

बे -वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दरमियाँ मैंने कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मंज़िल का निशान नहीं देखा

यह फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुम ने मेरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छु कर नहीं देखा..


मुसाफिर को रोका ही नहीं

उम्र भर चाहा के ज़मीन -ओ-आसमान हमारा होता
काश कहीं तो ख्वाहिशों का भी कोई किनारा होता
यह सोच के उस मुसाफिर को रोका ही नहीं
दूर जाता ही क्यों अगर वो हमारा होता…


मैं हूँ बेवफ़ा मुसाफिर
 

मैं हूँ बेवफ़ा मुसाफिर मेरा नाम बे-बसी है
मेरा कोई भी नहीं है जो गले लगा के रोये

मेरे पास से गुज़र कर मेरा हाल तक न पूछा
मैं यह कैसे मान जाऊँ के वो दूर जा के रोय

शब् -ऐ -ग़म की आप बीती जो सुनाई अंजुमन में
कई सुन के मुस्कुराये कई मुस्कुरा के रोये..


मुसाफिर बना दिया

निकले थे इस आस पे , किसी को बना लेंगे अपना
एक ख़्वाइश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया .

Leave a Reply