2 Lines Shayari – मुहब्बत में झुकना…

आज़ाद कर दूंगा तुमको अपनी मुहब्बत की क़ैद से,
करे जो हमसे बेहतर तुम्हारी क़दर पहले वो शख्स तो ढूँढो|

काश तुझे सर्दी के मौसम मे लगे मुहब्बत की ठंड,
और तू तड़प कर माँगे मुझे कम्बल की तरह|

मुहब्बत में झुकना कोई अजीब बात नही,
चमकता सूरज भी तो ढल जाता है चाँद के लिए।

मुहब्बत में यही खौफ क्यों हरदम रहता है,
कही मेरे सिवा किसी और से तो मुहब्बत नहीं उसे|

कहीं फिसल ना जाओ ज़रा संभल के रहना,
मौसम बारिश का भी है और मुहब्बत का भी|

“उसे कह दो कि वो किसी और से,मुहब्बत कि ना सोचें,
एक हम ही काफी है,उसे उम्र भर चाहने के लिए!

सुना है तुम्हारी एक निगाह से कत्ल होते हैं लोग,
एक नज़र हमको भी देख लो.. ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती!!

मुझे सिर्फ दो चीजों से डर लगता है,
1 तेरे रोने से और 2 तुझे खोने से|

मानो तो हर पत्थर मेँ खुदा बसता है,
अंदाज यही से लगा सकते हैँ आप, कि खूदा कितना सस्ता है|

जिन के आंगन में अमीरी का शजर लगता है,
उन का हर एब भी जमानें को हुनर लगता है।

ये ही एक फर्क है तेरे और मेरे शहर की बारिश में,
तेरे यहाँ ‘जाम’ लगता है, मेरे यहाँ ‘जाम’ लगते हैं|

लगता है मेरी नींद का किसी के साथ चक्कर चल रहा है,
सारी सारी रात गायब रहती है|

तुम ना लगा पाओगे अंदाजा मेरी तबाही का,
तुमने देखा ही कहाँ है मुझको शाम होने के बाद!

रुकी-रुकी सी लग रही है नब्ज-ए-हयात,
ये कौन उठ के गया है मेरे सिरहाने से।

निगाहों से भी चोट लगती है.. जनाब,
जब कोई देख कर भी अन्देखा कर देता है!!

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