“तरसती निगाहे” हिंदी बेस्ट पोएम

Written by:-

Anil Kulkarni 

hindi poem

तरसती निगाहे मंजिल को ढूंढती है।
छलनामय (धोखा) जग से डरती है।
डरती है, मोह, माया बंधन से।
भवितव्य (भविष्य) में क्या है?
अब यह सोचती है।

न समझ सकी इस जग को।
समझ न सकी पामर दुनिया को।
आभा(दिया) के बुझने पर तिमिर (अंधेरा)
हो जाती।
खुशियां आने पर दुख ज़रूर आती।

कुछ कलियां खिल न पाए यहां।
यौवन क्षण भर के लिए रूके यहां।
दुरूह (मुस्किल) है, इस  चक्रव्यूह से निकलना।
जिसमे है, सुख-दुख का झरना।

लोगों से न रूठी, रूठी अपने अदृष्ट पर।
जीवन में हंसते- हंसाते रही, पर माना
मुझे अपना पल -भर।

तपोमय है, जीवन यहां।
जिसकी न होती अंत कभी।
अंत  होता सिर्फ शरीर का यहां।
रह  जाते सिर्फ यादें यहां।…

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Tera saath hai

Tera saath hai

Tera saath hai

तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है
अंधेरो से भी मिल रही रोशनी है
कुछ भी नहीं है तो कोई गम नहीं है
हर एक बेबसी बन गयी चांदनी है

टूटी है कश्ती, तेज है धारा
कभी ना कभी तो मिलेगा किनारा
बही जा रही ये समय की नदी है
इसे पार करने की आशा जगी है

हर इक मुश्किल सरल लग रही है
मुझे झोपडी भी महल लग रही है
इन आँखों में माना नमी ही नमी है
मगर इस नमी पर ही दुनिया थमी है

मेरे साथ तुम मुस्कुरा के तो देखो
उदासी का बादल हटा के तो देखो
कभी हैं ये आँसू, कभी ये हँसी हैं
मेरे हमसफ़र बस यही जिन्दगी है…

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Tere Ishq Ki Inteha Chahta Huun, Meri Sadgi Dekh

Tere Ishq Ki Inteha Chahta Huun
Meri Sadgi Dekh Kya Chahta huun
sitam ho ki ho vada-e-be-hijabi
koi baat sabr-azma chahta huun
ye jannat mubarak rahe zahidon ko
ki main aap ka samna chahta huun
zara sa to dil huun magar shoḳh itna
vahi lan-tarani suna chahta huun
koi dam ka mehman huun ai ahl-e-mahfil
charagh-e-sahar huun bujha chahta huun
bhari bazm men raaz ki baat kah di
bada be-adab huun saza chahta huun

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी
कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ
ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ
ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना
वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल
चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ

ترے عشق کی انتہا چاہتا ہوں
مری سادگی دیکھ کیا چاہتا ہوں
ستم ہو کہ ہو وعدۂ بے حجابی
کوئی بات صبر آزما چاہتا ہوں
یہ جنت مبارک رہے زاہدوں کو
کہ میں آپ کا سامنا چاہتا ہوں
ذرا سا تو دل ہوں مگر شوخ اتنا
وہی لن ترانی سنا چاہتا ہوں
کوئی دم کا مہماں ہوں اے اہل محفل
چراغ سحر ہوں بجھا چاہتا ہوں
بھری بزم میں راز کی بات کہہ دی
بڑا بے ادب ہوں سزا چاہتا ہوں…

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Read Harivansh Rai Bachchan poems in hindi

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।…

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ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर ना जाने गये किधर तन्हा

-गुलज़ार…

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चलो ना भटके 

चलो ना भटके
लफंगे कूचों में
लुच्ची गलियों के
चौक देखें
सुना है वो लोग
चूस कर जिन को वक़्त ने
रास्तें में फेंका था
सब यहीं आके बस गये हैं
यह छिलके हैं ज़िंदगी के
इन का अर्क निकालो
की ज़हर इन का
तुम्हारे जिस्मों में
ज़हर पलते हैं
और जितने वो मार देगा
चलो ना भटके
लफंगे कूचों में

-गुलज़ार…

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राज़ की बातें लिखी और खत खुला रहने दिया

राज़ की बातें लिखी और खत खुला रहने दिया
जाने क्यों रुसवां का सिलसिला रहने दिया

उम्र भर मेरे साथ रहकर वो ना समझा दिल की बात
दो दिलों के दरमियाँ इक फासला रहने दिया

अपनी फितरत वो बदल पाया ना इसके बावजूद
ख़त्म की रंजिश मगर गिला रहने दिया

मैं समझता था खुशी देगी मुझे “साबिर” फरेब
इस लिए मैं ने गमों से राब्ता रहने दिया

-साबिर जलालाबादी…

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तू कहीं भी रहे सर पे तेरे इल्ज़ाम तो है

तू कहीं भी रहे सर पे तेरे इल्ज़ाम तो है
तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम तो है

मुझको तू अपना बना या ना बना तेरी खुशी
तू ज़माने में मेरे नाम से बदनाम तो है

मेरे हिस्से में कोई जाम ना आया ना सही
तेरी महफ़िल में मेरे नाम कोई शाम तो है

देख कर लोग मुझे नाम तेरा लेते हैं
इस पे मैं खुश हूँ मुहब्बत का ये अंजाम तो है

वो सीतमगार ही सही देख के उसको “साबिर”
शुक्र इस दिल-ए-बीमार को आराम तो है

-साबिर जलालाबादी

 …

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तुम्हारे खत में नया इक सलाम किस का था

तुम्हारे खत में नया इक सलाम किस का था
ना था रक़ीब तो आखिर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे निभाएँगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा ना दिल में वो बे-दर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

ना पूछ पूछ किसी की ना आव-भगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे खत के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़त से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

हर एक से कहते हैं क्या “दाग” बेवफा निकाला
ये पूछे इन से कोई वो गुलाम किस का था

-दाग देहलवी…

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बात निकली है तो दूर तक जानी चाहिये.

बेटी निकलती है तो कहते हो छोटे कपड़े पहन कर मत जाओ,
पर बेटे से नहीं कहते हो की नज़रों मैं गंदगी मत लाओ.
बेटी से कहते हो की कभी घर की इज़्ज़त खराब मत करना.
बेटे से क्यों नहीं कहते की किसी के घर
की इज़्ज़त से खिलवाड़ नहीं करना?
हर वक़्त हो नज़र बेटी के फोनपे पर,
ये भी तो देखो बेटा क्या करता है इंटरनेटपे.
किसी लड़के से बात करते देख जो भाई भड़कता है,
वोही भाई अपनी गर्लफ्रेंड के
किस्से घर मैं हंस हंस कर सुनाता है.
बेटा घूमे गर्लफ्रेंड के साथ तो कहते हो
अरे बेटा बड़ा हो गया.
बेटी अपने अगर दोस्त से भी बातें
करें तो कहते हो बेशर्म हो गयी,
इसका दिमाग खराब हो गया.
पहले शोषण घर से बंद करो तब
शिकायत करना समाज से.
हर बेटे से कहो की हर बेटी की इज़्ज़त करे आज से,
बात निकली है तो दूर तक जानी चाहिये.
#Tushidha
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