Rajputana Poetry Hindi About Great Rajputana Glory.

Read Rajputana poem is dedicated to those heroes who laid down their lives for the glory of Rajputana. and those rajput women who did johar for glory of rajputana.

जलती रही जौहर मे नारियां, भेड़िये फिर भी मौन थे |
हमे पढ़ाया अकबर महान, तो फिर ‘महाराणा’ कौन थे?

क्या वो नहीं महान हो बड़ी बड़ी ,सेनाओ पर चढ़ जाता था |
या फिर वो महान था जो सपने मे, प्रताप को देख कर दर जाता था |

रणभूमि मे जिनके हौसले, दुश्मनों पर भारी पड़ते थे |
ये वो भूमि है जहां पर नरमुण्ड़, घंटो तक लड़ते थे ||

रानियो का सोन्दर्य सुनकर , वो वहसी कई बार यहाँ आए |
धन्य थी वो स्त्रियाँ , जिनकी अस्थियाँ तक छू नहीं पाये ||

अपने सिंहो को वो सिहनियाँ , फौलाद बना देती थी |
जरूरत जब पड़ती , काटकर शीश थाल सजा देती थी |

पराजय जिनको कभी सपने मे स्वीकार नही थी |
अपने प्राणो का मोह करे, वो पीढ़ी इतनी गद्दार नहीं थी ||

वो दुश्मनों को पकड़कर निचोड़ दिया करते थे |
पर उनकी बेगमों को भी, माँ कहकर छोड़ दिया करते थे |

तो सुनो यारों एसे वहशी , दरिंदों का जाप मत करो |
वीर सपूतो को बदनाम करने का पाप अब मत करो |…

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मैं सबसे छोटी होऊं – Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)

मैं सबसे छोटी होऊँMain Sabse Choti Hou, Sumitranandan Pant, Hindi Poem तेरी गोदी में सोऊँ
तेरा आँचल पकड़-पकड़कर

फिरू सदा माँ तेरे साथ
कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ

बड़ा बनाकर पहले हमको
तू पीछे छलती है माँ
हाथ पकड़ फिर सदा हमारे
साथ नहीं फिरती दिन-रात

अपने कर से खिला, धुला मुख
धूल पोंछ, सज्जित कर गात
थमा खिलौने, नहीं सुनाती
हमें सुखद परियों की बात

ऐसी बड़ी न होऊँ मैं
तेरा स्‍नेह न खोऊँ मैं
तेरे अंचल की छाया में
छिपी रहूँ निस्‍पृह, निर्भय
कहूँ दिखा दे चंद्रोदय

∼ सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत (मई 20, 1900 – दिसंबर 28, 1977) का जन्म सुरम्य वातावरण में रविवार 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कुमायूं की पहाड़ियों में स्थित बागेश्वर के एक गांव कौसानी में हुआ था | पंत जी हिंदी में छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त। वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। सन 1942 के भारत छोडो आन्दोलन, 1947 के भारत विभाजन, 1962 के चीन का आक्रमण तथा 1965 के पाकिस्तान के युद्ध की विभीषिका ने उनकी सोच को अत्यधिक प्रभावित किया, जिसके दिग्दर्शन उनकी कविताओ में होते है…

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Hindi Love Poem on Vo ek Chehra

 

सब कुछ तो है क्या ढूँढ़ती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता,
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है, वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता,
वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता..

 
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Ek sabd hai

एक शब्द है ( मोहब्बत )
इसे कर के देखो तुम
तड़प ना जाओ तो कहना,
एक शब्द है ( मुकद्दर )
इससे लड़कर देखो तुम
हार ना जाओ तो कहना,
एक शब्द है ( वफा )
जमाने में नहीं मिलती कहीं
ढूंढ पाओ तो कहना,
एक शब्द है ( आँसू )
दिल में छुपा कर रखो
तुम्हारी आँखों से ना निकल जाए तो कहना,
एक शब्द है ( जुदाई )
इसे सह कर तो देखो
तुम टूट कर बिखर ना जाओ तो कहना,
एक शब्द है ( ईश्वर )
इसे पुकार कर तो देखो
सब कुछ पा ना लो तो कहना…..…

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ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर ना जाने गये किधर तन्हा

-गुलज़ार…

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चलो ना भटके 

चलो ना भटके
लफंगे कूचों में
लुच्ची गलियों के
चौक देखें
सुना है वो लोग
चूस कर जिन को वक़्त ने
रास्तें में फेंका था
सब यहीं आके बस गये हैं
यह छिलके हैं ज़िंदगी के
इन का अर्क निकालो
की ज़हर इन का
तुम्हारे जिस्मों में
ज़हर पलते हैं
और जितने वो मार देगा
चलो ना भटके
लफंगे कूचों में

-गुलज़ार…

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राज़ की बातें लिखी और खत खुला रहने दिया

राज़ की बातें लिखी और खत खुला रहने दिया
जाने क्यों रुसवां का सिलसिला रहने दिया

उम्र भर मेरे साथ रहकर वो ना समझा दिल की बात
दो दिलों के दरमियाँ इक फासला रहने दिया

अपनी फितरत वो बदल पाया ना इसके बावजूद
ख़त्म की रंजिश मगर गिला रहने दिया

मैं समझता था खुशी देगी मुझे “साबिर” फरेब
इस लिए मैं ने गमों से राब्ता रहने दिया

-साबिर जलालाबादी…

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तू कहीं भी रहे सर पे तेरे इल्ज़ाम तो है

तू कहीं भी रहे सर पे तेरे इल्ज़ाम तो है
तेरे हाथों की लकीरों में मेरा नाम तो है

मुझको तू अपना बना या ना बना तेरी खुशी
तू ज़माने में मेरे नाम से बदनाम तो है

मेरे हिस्से में कोई जाम ना आया ना सही
तेरी महफ़िल में मेरे नाम कोई शाम तो है

देख कर लोग मुझे नाम तेरा लेते हैं
इस पे मैं खुश हूँ मुहब्बत का ये अंजाम तो है

वो सीतमगार ही सही देख के उसको “साबिर”
शुक्र इस दिल-ए-बीमार को आराम तो है

-साबिर जलालाबादी

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तुम्हारे खत में नया इक सलाम किस का था

तुम्हारे खत में नया इक सलाम किस का था
ना था रक़ीब तो आखिर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे निभाएँगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा ना दिल में वो बे-दर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

ना पूछ पूछ किसी की ना आव-भगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे खत के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़त से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

हर एक से कहते हैं क्या “दाग” बेवफा निकाला
ये पूछे इन से कोई वो गुलाम किस का था

-दाग देहलवी…

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