लस्सी किंग – समर्थ (बच्चों की कहानी) Kids Story in Hindi

लस्सी किंग – Kids Story in Hindi

रतनपुर गांव में समर्थ नाम का एक बच्चा रहता था। उसकी उम्र महज १३ साल की थी। समर्थ इतना छोटा था, लेकिन कई डाकुओं से लड़ने की हिम्मत रखता था। गांव में जब भी डाकू या चोर आता, लोग समर्थ को आगे कर देते। समर्थ की एक ही ताकत थी, लस्सी। गांव में सब उसको लस्सी किंग के नाम से जानते थे। जब लस्सी पीने को नहीं मिलती, तो समर्थ दुःखी हो जाता था। समर्थ का दिमाग काम करना बंद हो जाता था और उसका शरीर भी कमजोर पड़ने लगता था; लेकिन जब उसको लस्सी मिल जाती, वह उत्साहित हो जाता और अपने आप में एक स्फूर्ति महसूस करता।

एक बार समर्थ ने घर की सारी बनाई हुई लस्सी पी ली। मां ने उसको बहुत सुनाया और कहा की अब तूझे लस्सी नहीं मिलेगी। जा चला जा यहां से तू। उस गांव में चंपा रानी की लस्सी बहुत प्रचलित थी। उसको सब रानी की लस्सी के नाम से जानते थे। गांव के बीच एक पीपल का पेड़ था, इसके नीचे बैठकर चंपा रानी लस्सी बेचती थी। उनका घर भी पीपल के पेड़ के पास में ही था। समर्थ चुपके से उनके पास चला गया और जब उसने देखा की चंपा रानी कुछ लेने के लिए घर पे गई है, तब चुपके से आके समर्थ ने सारी लस्सी पी ली और वापस घर चला गया। उसके घर जाने के बाद, चंपा रानी को पता चलते ही, वो तुरंत समर्थ के घर आई और कहा,“ प्रेमवती जी, बाहर निकालिए, अपने लाडले को जरा! देखो, देखो जरा! मेरी सारी लस्सी वो पी गया। अब घर में दही भी नहीं बचा है, मैं कैसे लस्सी बनाऊं अब? बताओ जरा मुझे। अपने लाडले को जरा समझाए और इसको घर पे रस्सी से बांधकर रखो, कुछ दिन। लस्सी के बिना रखो कुछ दिन उसको। ”

प्रेमवती ने एक मजबूत रस्सी से उसको बांध दिया और अपना काम करने लगी। रात को प्रेमवती ने रस्सी खोल दी, लेकिन दो – तीन दिनों तक लस्सी भी उसको नहीं दी। एक कमरे में उसको बंद कर दिया। तीन दिनों के बाद उसको बंद कमरे से बाहर निकाला, लेकिन गांव में किसी को भी लस्सी देने से मना किया। दो – तीन दिन तक लस्सी न पीने से उसका शरीर सुखा पड़ गया और शरीर में पूरी तरह से कमजोरी आ गई। वह बीमार हो गया और तीन दिन के बाद वो घर …

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3 Very Good Moral Stories in Hindi – तीन प्रेरणादायक कहानियां

हमारी जिंदगी में ऐसी बहुत सी घटनाएं होती है जो हमें कोई ना कोई सीख देती है लेकिन हमें से ज्यादातर लोग इन घटनाओं को नजरअंदाज कर देते है। ऐसे में ये good moral stories in hindi आपको और आपके बच्चों को नैतिक मूल्यों को समझने के लिए जरुर पढ़नी चाहिए..

1). हमेशा सोच समझकर बोलना चाहिए – Moral Story in Hindi

एक बार एक किसान और उसके पडोसी के बीच खूब लड़ाई हुई। लड़ाई में किसान ने अपने पड़ोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया और उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा, संत ने किसान की बात सुनकर उसे ढेरों पंख इकठ्ठा करने को कहा, और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रखने का आदेश दिया।

संत की बात मानकर किसान ने पंख शहर के बीचों -बीच रख दिए और दोबारा संत के पास पहुंचा। संत ने अब किसान से उन पंखों को वापस लाने को कहा। लेकिन किसान जब उन पंखों को लेने शहर के बीचों बीच पहुंचा तो वहां से सारे पंख उड़ चुके थे। जिस वजह से किसान को खाली हाथ संत के पास जाना पड़ा।

संत के पास जब किसान पहुंचा तो उसने बताया कि उसके जाने तक सारे पंख उड़ चुके थे। फिर संत ने किसान को समझाया कि इसी तरह एक बार मुंह से निकले शब्दों को भी वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए कभी भी किसी को अपशब्द कहने से पहले सोच लेना चाहिए।

ये थी one of the good moral stories in Hindi.

2). दोस्तों को किसी कमी के कारण नहीं छोड़ना चाहिए – Best Moral Story in Hindi

एक फार्म हाउस में दो घोड़े रहते थे। दूर से देखने पर दोनों घोड़े बिलकुल एक जैसे दिखते थे, लेकिन पास जाने पर पता चलता था कि उनमे से एक घोड़ा अँधा है। पर अंधा होने के बावजूद भी उसे उसके मालिक ने वहां से निकाला नहीं था बल्कि उसे और भी अधिक सुरक्षा और आराम के साथ रखा था।

मालिक ने दूसरे घोड़े के गले में एक घंटी बाँध रखी थी, जिसे अँधा घोड़ा घँटी की आवाज सुनकर उस घोड़े के पास पहुंच जाता और उसके पीछे-पीछे बाड़े में घूमता।

घंटी वाला घोड़ा भी अपने अंधे मित्र की परेशानी समझता, और बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता और इस बात को सुनिश्चित करता कि कहीं अँधा घोड़ा रास्ते से भटक ना जाए।

अँधे …

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“असमंजस” स्कूल लव स्टोरी इन हिंदी

-निधि जैन

.          लखनऊ शहर के मशहूर सिनेमा घर मेफेयर के सामने वाला चौराहा उसके ही नाम से प्रसिद्ध था। मेरी स्कूटी अभी उस चौराहे पर पहुँची ही थी कि पुलिस वाले ने हाथ दिखा कर ट्रैफिक रोक दिया। किसी गणमान्य व्यक्ति का काफिला गुजरने वाला था। मैंने घड़ी पर नजर डाली, दोपहर का पौन बज रहा था। गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को झुलसा रहे थे।  मई का महीना, उस पर उत्तर-प्रदेश की लू वाली गर्मी। पता नहीं क्या सोच कर मैं भरी गर्मी में स्कूटी उठा कर चल दी। अच्छा खासा प्रदीप ए.सी गाड़ी भेज रहा था। उसमें चली जाती तो क्या बिगड़ जाता, पर हर जगह मेरा स्वाभिमान जो आड़े आ जाता है। पता नहीं अब यहाँ  कितनी देर खड़ा रहना पड़ेगा। हर गुजरते पल के साथ मेरी बेचैनी बढ़ रही थी। इस बेचैनी का कारण गर्मी थी या चौराहे पर खड़े हो कर इंतजार करना या फिर घर से निकलते समय आयुष का फोन। आयुष मेरा पड़ोसी और मेरा सबसे अच्छा दोस्त था। आज पता नहीं फोन पर कुछ अजीब सी बातें कर रहा था। पुरानी बातें दिल से निकल कर दिमाग पर दस्तक देने लगी थीं।

.          उस समय मेरी उम्र करीब पाँच साल थी। एक दिन मैं स्कूल से लौटी तो पापा-मम्मी अपने कमरे में उदास बैठे थे। मैंने पहले कभी उन्हें ऐसे नहीं देखा था। पापा उठ कर कमरे के बाहर चले गये। मैं रोज की तरह माँ को अपनी दिन-भर की कहानियाँ सुनाने लगी। माँ एकदम शांत भाव से मेरी बातें सुनती रही। अचानक उसने मुझे गले से लगा लिया और फफक-फफक कर रो पड़ी। मैंने घबरा कर पूछा, “माँ, रो क्यों रही हो? तुम ही तो कहती हो कि अच्छे बच्चे रोते नहीं।” तभी पापा कमरे में दाखिल हुए, उन्होंने  मुझे आया के साथ कमरे के बाहर भेज दिया। थोड़ी देर बाद माँ-पापा मुसकुराते हुए बाहर आये और ऐसा लगा जैसे सब कुछ सामान्य हो गया।

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.         सच तो यह था कि कुछ भी सामान्य नहीं था। पापा, माँ को ले कर अस्पताल जाने लगे और मैं स्कूल से आ कर पड़ोस वाली आन्टी के घर। आन्टी का व्यवहार मेरे साथ बहुत ही सख्त और रूखा था। वह न तो मुझसे कोई बात करती और न ही कुछ खाने को देती। तीन-चार दिन बाद ही उन्होंने पापा से कह दिया, “आप अपना कुछ और इंतजाम कर लें। मुझे बच्चे की वजह से बहुत बंधन हो जाता है।” पापा ने मेरी स्कूल …

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एक घायल पक्षी की आत्मकथा – Ak Ghayal Pakshi Ki Atmakatha

 नमस्कार दोस्तों आपका दिल से स्वागत हे तो आज हम एक घायल पक्षी की आत्मकथा के बारे में बात करने वाले हे कैसे वो पक्षी घायल होता हे कैसे वो पहले और अब ज़िन्दगी को बिताता हे उसने क्या – क्या सपने देखे थे और क्या हो गया ये सब हम इस पोस्ट के माध्यम से आपको बताने वाले हे हमें उम्मीद हे की आपको ये पोस्ट जरूर पसंद होगी। 

एक घायल पक्षी की आत्मकथा

 प्रस्तावना : 

           जी हां दोस्तों में एक घायल पक्षी हु आज जो मेरा ये हाल हे उसके पीछे एक शरारती लडके का हाथ हे उसकी एक छोटी सी भूल की वजह से मेरा ये हाल हे मेरे पंख जो मुझे बहुत ही प्यारे थे वो ही आज मेरे पास नहीं हे मेरे शरीर से खून बह रहा हे पता नहीं कब मेरी मौत हो जाये और में इस पीड़ा से आज़ाद हो जाऊ इसलिए में मरने से पहले में आपको अपने बारे में आपको बताना चाहता हु।

मेरा बचपन : 

  मेरे बचपन के दिन बहुत ही सुहाने थे एक बड़ा सा बरगद के पेड़ पर हमारा घोंसला था जिसमे मेरे छोटे भाई – बहन और में रहते थे यानिकि मेरा परिवार बहुत छोटा था मेरे माँ हमें छोड़कर दाने लेने जाती हम तीनो भाई – बहन अपनी माँ की राह देखते और उसके वापस आते देखकर हमारी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। हम अपनी – अपनी चोंच खोल देते और माँ उसमे दाने डालती उसी प्रकार हर दिन माँ हमारे लिए दाने लेने जाती और हमारा भरण पोषण करती इसी प्रकार दिन बीतते गए और हम बड़े होते गए। 

मेरे सुनहरे पल 

  जब हम बड़े हुए तो हमारी भी इच्छा हुई उड़ने की तो माँ ने हमको उड़ना सिखाया तब में और मेरे भाई बहन शरुआत में एक डाल से दूसरी डाली पर जाते कभी कभी गिर भी जाते थे ऐसे कर कर के हमने उड़ना सिख लिए अब हम ऊँची आकाश में उड़ सकते हे किसी भी पेड़ पर आसानी से बैठ सकते हे यानिकि उड़ने हम माहिर हो गए थे।

अब हम तीनो भाई – बहन दूर – दूर की सैर करने लगे। मनचाहे पेड़ो पर बैठकर मनचाहे फल खाते बड़े और ऊँचे झरनों का मीठा पानी पीते मौज मस्ती करते ये मेरे जीवन के सुनहरे दिन थे। 

मेरा घायल होना 

  एक दिन की बात हे हम दिनों भाई – बहन हर दिन की तरह सैर करने गए थे अपने मनचाहे फल …

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कोई भूख के लिए खाता है तो कोई सेल्फी के लिए – Hindi Kahani on Modern Society

मैं हिमाचल के धर्मशाला शहर में रहता हूँ. जिन लोगों को नहीं पता, उन्हें बता दू कि धर्मशाला एक टूरिस्ट प्लेस है. क्यूंकि यहाँ का मौसम काफी ठंडा है, हर साल गर्मियों में लाखों लोग यहाँ घूमने आते है. मेरे घर के पास एक कैफ़े ( Cafe ) है जहाँ मैंने अक्सर कॉफ़ी या जूस पीने जाता हूँ और साथ में अपना लैपटॉप भी ले जाता हूँ ताकि कोई नयी कहानी लिख सकू, काफी शांत जगह पर बना है ये कैफ़े.

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Hindi Kahani on Modern Society

एक दिन शाम के वक़्त मैं उसी कैफ़े में गया और कैफ़े के बाहर एक टेबल पर बैठ कर कॉफ़ी पीते पीते कुछ सोच रहा था कि कही से 2 लड़का और लड़की मेरे पास आये और पैसे मांगने लगे. देख कर लग रहा था कि वो दोनों भाई बहन है, उनके कपडे काफी गंदे थे. हमारे यहाँ धर्मशाला में अक्सर ऐसे मांगने वाले आते रहते है. मैंने पैसे देने को मना कर दिया और उन्हें इग्नोर कर दिया। फिर भी 1 मिनट तक वो मुझसे मांगते रहे लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया.

कुछ समय बाद वो दोनों सड़क पर आते जाते लोगो से पैसे मांगने लगे. उन्हें 2 मिनट तक देखने के बाद मैंने उन्हें आवाज़ लगायी और अपने पास बुलाया.

“मैं पैसे तो नहीं दूंगा लेकिन अगर भूख लगी है तो कुछ खिला देता हूँ” मैंने उन दोनों को कहा.

उन्होंने कैफ़े में लगी मसाला डोसा की तस्वीर की तरफ इशारा किया। मैंने उन्हें कहा जाओ, आर्डर कर दो, मैं पैसे दे दूंगा. जैसे ही उनका मसाला डोसा आया उन्होंने महज़ 2 मिनट में खा लिया। मैंने आज तक इतना भूखा किसी को नहीं देखा था, उन पर दया आ रही थी. “यकीनन उन्होंने काफी देर से कुछ नहीं खाया होगा …..अच्छा किया जो इन बेचारो को खिला दिया ” मैंने मन ही मन सोचा और अपने लैपटॉप पर कुछ लिखना शुरू कर दिया.

दो मिनट बाद मेरा ध्यान सामने से आ रही तीन लड़कियों पर गया. एक दम मॉडर्न लड़कियां, अपने अपने हाथ में iPhone पकडे हुए कैफ़े की तरफ आ रही थी. करीब 15 से 16 साल की लग रही थे वे तीनो लड़कियां और उन्हें देख कर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता था कि वे काफी अमीर घर से है.

“भईया….2 पास्ता, एक स्माल पिज़्ज़ा और तीन ऑरेंज जूस” उन लड़कियों में से एक ने कैफ़े के वेटर को आर्डर किया. मैं उन्हें देख नहीं रहा था लेकिन मेरा …

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अंधेरे में : निर्मल वर्मा की कहानी | Andhere Mein Hindi Story Nirmal Verma

अंधेरे में निर्मल वर्मा की कहानी (Andhere Mein Story By Nirmal Verma) Andhere Mein Nirmal Verma Ki Kahani

Andhere Mein Story By Nirmal Verma

बीच की तीन पगडंडियों को पार कर बानो आती थी। आते ही पूछती थी, “कुछ पता चला?” मेरा मन झूठ बोलने के लिए मचल उठता। सोचता, कह दूं – “हाँ, पता चल गया..हम दिल्ली जा रहे हैं।“ लेकिन बानो झूठ ताड़ जाएगी, इसलिए आँखें मूंदे रहता।

बानो मेरे माथे पर हाथ रखती। जब उसका हाथ ठंडा लगता, मैं जान जाता कि अभी बुखार है, जब गरम लगता तो मन उल्लसित हो उठता।

आँखें खोलकर पूछता – “कैसा लगता है बानो?”

और बानो निराशा भरे स्वर में कहती, “अभी तो कम है, लेकिन शाम तक जरूर चढ़ जायेगा।”

बानो समझती थी कि जब तक बुखार रहेगा, हम उसके संग शिमले में ही रहेंगे। बुखार उतरने लगता, तो उसे निराशा होती। जब कभी बानो की आहट मिल जाती, मैं जानबूझकर पास रखे ठंडे पानी से अपना माथा रगड़ लेता। जब वह आती, तो उसका हाथ अपने माथे पर रखकर पूछता, “देखो तो बानो, कितना ठंडा है।“

बानो गुमसुम-सी खिड़की के बाहर देखती रहती।

खिड़की के बाहर नीले जंगल हैं; ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ है; पेड़ों के घने झुरमुट हैं। जब हवा का झोंका परदे को ढुलाता हुआ भीतर आता है, दूर दिगंत की एक स्वप्निल-सी खूशबू कमरे में बिखर जाती है।

“इन पहाड़ों के पीछे दिल्ली है। है न बानो?” मैं पूछता।

बानो ने चुपचाप सिर हिला दिया। उसे दिल्ली की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कभी-कभी मुझे उस पर काफी तरस आता। उस बेचारी ने अब तक दिल्ली नहीं देखी थी। उसके अब्बा का दफ्तर बारहों महीने शिमले रहता था।

“मैं आज गयी थी-अपने घर।” बानो ने कहा। जिस ‘अपने घर’ का नाम सुनकर मैं सबकुछ भूल जाता था, आज उसके प्रति मेरे मन में कोई उत्सुकता नहीं जगी।

“मेरे अलूचे तुम ले लेना…बानो।” मैं आँखें मूंदे लेटा रहा।

“तुम्हारे गले-सड़े अलूचे कौन खायेगा। जब दिल्ली जाओगे, अपनी पोटली में बांधकर ले जाना।“ बानो खीजकर बाहर बरामदे में भाग गयी।

मुझे गुस्सा लगा। लेकिन बीमारी में गुस्सा भी टूटा-फूटा आता है, कोई भी भाव अंत तक नहीं पहुँच पाता, बीच रास्ते में ही सूख जाता है। जब रोने को जी करता है, तो रोना नहीं आता, आँखें ही बिफरी-सी रह जाती हैं। जब खुशी होती है, तो दिल तेजी से नहीं धड़कता, केवल होंठ कांपकर रह जाते हैं।

इन दिनों मेरे कमरे में आने से पहले बानो की …

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आदमी और लड़की निर्मल वर्मा की कहानी | Aadmi Aur Ladki Hindi Story By Nirmal Verma

प्रस्तुत है – आदमी और लड़की निर्मल वर्मा की कहानी (Aadmi Aur Ladki Story By Nirmal VermaAadmi Aur Ladki Nirmal Verma Ki Kahani एक उम्रदराज़ विवाहित व्यक्ति और एक कमउम्र लड़की के प्रेमसंबंधों के उतार-चढ़ाव को चित्रित करती है. पढ़िए :

Aadmi Aur Ladki Story By Nirmal Verma

उसने दुकान का दरवाज़ा खोला, तो घंटी की आवाज़ हुई-टन। जब वह भीतर आया और दरवाज़ा मुड़कर देहरी से दोबारा सट गया; तो घंटी दोबारा बजी, इस दफ़ा दो बार-टन, टन।

यह दूसरी आवाज़ काफ़ी देर तक गूंजती रही। यह चेतावनी थी कि कोई भीतर आया है।

दुकान में कोई नहीं था। उसे हमेशा लगता था कि यदि वह शेल्फ़ से दो-चार किताबें उठा कर भाग जाये, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। यह उसका भ्रम था। घंटी बजते ही काउंटर के पीछे दो आँखें उसे अनजाने में ही पकड़ लेती थीं-आँखें, जो नीली थीं और गीली भी। ऐनक के पीछे दो डबडबाये धब्बे उसे निहार रहे थे।

वह किताबों की अलमारियों के बीच रास्ता टटोलता हुआ काउंटर के सामने आ खड़ा हुआ।

‘क्या हाल हैं?’ उसने पूछा।

अधेड़ मैनेजर ने उसकी ओर देखा; फिर कंधे उचका दिये, जिससे कुछ पता नहीं चला कि वह कैसे मूड में है।

‘सर्दी शुरू हो चली है।’ उसने कहा। मौसम का ख़याल अचानक उसे मैनेजर की मूंछें देखने पर हो आया था, जो इतनी सफ़ेद थीं, मानो अभी-अभी उन पर ताज़ा बर्फ़ गिरी हो।

‘होगी ही।’ बूढ़े ने तटस्थ भाव से कहा, ‘अक्टूबर का महीना है।’

‘अभी हीटिंग शुरू नहीं हुई?’

‘नवंबर से पहले नहीं, चाहे बर्फ़ ही क्यों न गिरने लगे।’ बूढ़ा बहुत ही महीन भाव से सरकार पर कटाक्ष करता था। मुद्दत पहले वह दुकान का मालिक था, अब नये तंत्र के नीचे, सरकार उसकी मालिक थी, उन किताबों की भी-जो उसके बाप-दादाओं ने पहली लड़ाई के ज़माने से जमा की थीं। दुकान वही थी, लेकिन रातों-रात क़ानून की लकीर उसके और बाप-दादा की विरासत के बीच एक खाई-सी खोल गई थी। काउंटर पर वह अब भी बैठता था-पहले की तरह। लेकिन अब किताबों से उसका रिश्ता कुछ वैसा ही था, जैसे कोई बाप जीते-जी अपने बच्चों को अनाथालय में देखता है।

‘आप सोचते हैं, क्या बर्फ़ गिरेगी?’ आदमी ने पूछा।

बूढ़े ने ऐनक उतारी, मैले रूमाल से शीशे साफ़ किये, फिर नाक सिनकी, ‘बर्फ़ और मौत घंटी बजा कर नहीं आती।’

उसे लगा, जैसे बूढ़े का इशारा उसकी तरफ़ है। पिछले दिनों जब कभी वह दुकान की घंटी …

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वो जो दबी सी आस बाकी है….Love Breakup Bewafai Zindagi !

Bewafai Story in Hindi

मेरा नाम अनु है और ये बात है 4 साल पहले की, मेरी नयी-नयी शादी हुई थी. वैसे तो मेरी arranged marriage थी लेकिन शादी से पहले मेरा एक बॉयफ्रेंड भी था जिसे मैं बहुत प्यार करती थी, उसका नाम अर्जुन था. शादी के बाद अभी एक महीना ही हुआ था कि मेरे पुराने बॉयफ्रेंड को मेरे ही ऑफिस में नौकरी मिल गयी. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा क्यूंकि मेरी शादी हो चुकी थी लेकिन फिर भी पता नहीं मुझे क्या सूझा कि मैंने अर्जुन से बात करनी शुरू कर दी, आखिर हम एक ही ऑफिस में तो थे.

एक दिन मैं ऑफिस के वाशरूम से निकल रही थी कि सामने अर्जुन खड़ा था, वो मेरे करीब आया, आँखों में आँखे डाले मुझे घूर रहा था, वो मेरे और करीब आया और हमने एक दुसरे को Kiss की. उस वक़्त पता नहीं मुझे क्या हो गया था, मैं शायद भूल गयी थी कि मैं शादीशुदा हूँ. कुछ देर इंटिमेट होने के बाद मुझे थोड़ा होश आया और मैंने अर्जुन को एकदम से अपने से दूर धक्का दिया और जा कर अपना काम करने लगी.

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अर्जुन ने मुझे बहुत समझाया लेकिन मुझे पता था कि शादी के बाद ये गलत है. मुझे इस बात का इतना अफ़सोस हुआ कि मैंने नौकरी छोड़ दी और फिर कभी ऑफिस नहीं गयी.

मुझे ये बात अंदर ही अंदर खाये जा रही थी कि मैंने अपने पति जिसका नाम रोहित है उसके साथ धोखा किया. मैंने शादी के बाद एक दुसरे मर्द के साथ सम्बन्ध बनाये और यही बात मुझे दिन रात परेशान कर रही थी. यूँही 2 महीने बीत गए, मुझे ऑफिस छोड़े अब 2 महीने होने को आये थे और मैंने सोचा क्यों ना मैंने अपने पति (रोहित) को सब सच सच बता दू.

मैंने ठीक समय देख कर रोहित को सब बता दिया. उस दिन रोहित शाम को ऑफिस से घर आये थे, मैं डरी हुई थी लेकिन फिर भी हिम्मत करके उसे कहा “रोहित मुझे माफ़ कर दो”

रोहित: अनु… किस बात की माफ़ी?

वो, मैंने शादी के बाद भी एक लड़के के करीब आ गयी थी लेकिन वो सब एक गलती थी और मैं तुमसे माफ़ी मांगती हूँ. मैं तुम्हे यकीन दिलाती हूँ कि कभी फिर ऐसा नहीं होगा.

रोहित: तुमने मेरे साथ धोखा किया है अनु, मैं घर छोड़ कर जा रहा हूँ।

“नहीं रोहित, प्लीज ऐसा मत करो, वो सिर्फ एक गलती थी, …

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मोहब्बत की पहचान : कृष्ण चंदर की कहानी | Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Short Story

प्रस्तुत है मोहब्बत की पहचान कृष्ण चंदर की कहानी (Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Ki Kahani) Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Short Story दो मोहब्बत करने वालों के अहम् के टकराव की कहानी है. क्या अहम् दोनों के बीच की मोहब्बत खत्म कर देगी. पढ़िये : 

Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Ki Kahani

Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Ki Kahani

पहले दिन जब उसने वक़ार को देखा, तो वो उसे देखती ही रह गई थी। अस्मा की पार्टी में किसी ने उसे मिलवाया था। “इनसे मिलो, ये वक़ार हैं।” वक़ार उसके लिए मुकम्मल अजनबी था, मगर उस अजनबीपन में एक अजीब सी जान-पहचान थी। जैसे बरसों या शायद सदियों के बाद आज वो दोनों मिले हों, और किसी एक ही भूली हुई बात को याद करने की कोशिश कर रहे हों।

दूसरी बार शाहिदा की कॉफ़ी पार्टी में मुलाक़ात हुई थी, और इस बार भी बज़ाहिर उस बेगानगी के अंदर वही यग़ानगत उन दोनों को महसूस हो रही थी। ये पहली निगाह वाली मुहब्बत नहीं थी। एक अजीब सी क़ुरबत और गहरी जान पहचान का एहसास था, जो दोनों के दिलों में उमड़ रहा था, जैसे बहुत पहले वो कहीं मिले हैं। बहुत लंबी-लंबी बहसें की हैं।

आदात, ख़यालात और ज़ाती पसंद के ताने-बाने पर एक-दूसरे को परखा है। वो दोनों एक-दूसरे के हाथ की गर्मी को जानते हैं। उस बर्क़ी रौ को पहचानते हैं, जो निगाहों ही निगाहों में एक-दूसरे को देखते ही दौड़ने लगती है। वो डोर जो दिल ही दिल में अंदर बंध जाती है और एक-दूसरे से अलग होने के बाद अपने-अपने घरों में अलग-अलग, अपने-अपने कमरों में अकेले आराम, सुकून और चैन से बैठे हुए भी यूं महसूस होती है, जैसे वो डोर हिल रही है।

एक ही समय में वक़्त और एहसास के एक ही सानहे में वो दोनों एक-दूसरे को याद कर रहे हैं। रात की तन्हाई में अज़्रा को अपने बिस्तर पर अकेले लेटे-लेटे एकदम एहसास हुआ, जैसे उसके बहुत ही क़रीब उसके चेहरे पर वक़ार झुका हुआ है। घबराकर उसने बेड स्विच दबा कर रौशनी की। कमरे में कोई न था। फिर भी वो घबरा-सी गई। लजा सी गई। उस एक लम्हे में ऐसा महसूस हुआ, जैसे उसका राज़ वक़ार को मालूम हो गया। तीसरी बार जब वक़ार से रऊफ़ की दावत पर मिली, तो बेइख़तियार उसकी आँखें झुक गईं और रुख़्सारों पे रंग आ गया। मुहब्बत करने वाली औरत का दिल बहुत शफ़्फ़ाफ़ होता है।

वक़ार और अज़्रा को एक-दूसरे के क़रीब आते ज़्यादा देर नहीं लगी। …

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जुड़वा भाई मुंशी प्रेमचंद की कहानी

प्रस्तुत है -जुड़वा भाई मुंशी प्रेमचंद की कहानी (Judwan Bhai Munshi Premchand Ki Kahani) Judwan Bhai Short Story By Munshi Premchand बचपन में बिछड़ गए दो जुड़वा भाइयों की कहानी, जो भिन्न परिस्थितियों में पले-बढ़े. क्या हुआ जब भेंट हुई? जानने के लिए पढ़िए : 

Judwan Bhai Munshi Premchand Ki Kahani

Judwan Bhai Munshi Premchand Ki Kahani

कभी-कभी मू्र्ख मर्द ज़रा-ज़रा-सी बात पर औरतों को पीटा करते हैं। एक गाँव में ऐसा ही एक किसान था। उसकी औरत से कोई छोटा- सा नुकसान भी हो जाता, तो वह उसे बग़ैर मारे न छोड़ता। एक दिन बछड़ा गाय का दूध पी गया। इस पर किसान इतना झल्लाया कि औरत को कई लातें जमाईं। बेचारी रोती हुई घर से भागी। उसे यह न मालूम था कि मैं कहाँ जा रही हूँ। वह किसी ऐसी जगह भाग जाना चाहती थी, जहां उसका शौहर उसे फिर न पा सके।

चलते-चलते वह जंगल में पहुँच गई। पहले तो वह बहुत डरी कि कोई जानवर न उठा जे जाये। मगर फिर सोचा, मुझे क्या डर जब दुनिया में मेरा कोई अपना नहीं है, तो मुझे जीकर क्या करना है। मरकर मुसीबत से तो छूट जाऊंगी। मगर उसे कोई जानवर न मिला और वह रात को एक पेड़ के नीचे सो गई। दूसरे दिन उसने उसी जंगल में एक छोटी-सी झोपड़ी बना ली और उसमें रहने लगी। लकड़ी और फूस की कोई कमी थी ही नहीं, मूंज भी इफ़रात से थी। दिन-भर में झोपड़ी तैयार हो गयी। अब वह जंगल में लकड़ियाँ बटोरती और उन्हें आस-पास के गाँवों में बेचकर खाने-पीने का सामान खरीद लाती। इसी तरह उसके दिन कटने लगे।

कुछ दिनों के बाद उस औरत के जुड़वा लड़के पैदा हुए। बच्चों को पालने-पोसने में उसका बहुत-सा वक्त निकल जाता और वह मुश्किल से लकड़ियाँ बटोर पाती। उसे अब रात को भी काम करना पड़ता। मगर इतनी मुसीबत झेलने पर भी वह अपने शौहर के घर न जाती थी।

एक-दिन वह दोनों बच्चों को लिये सो रही थी। गरमी की रात थी। उसने हवा के लिए झोपड़ी का दरवाजा खुला छोड़ दिया था। अचानक रोने की आवाज़ सुनकर उसकी नींद टूट गई, तो देखा कि एक बड़ा भारी भालू उसके एक बच्चे को उठाये लिये जा रहा है। उसके पीछे-पीछे दौड़ी, मगर भालू जंगल में न जाने कहाँ घुस गया। बेचारी छाती पीट-पीटकर रोने लगी।

थोड़ी देर में उसे दूसरे लड़के की याद आई। भागती हुई झोपड़ी में आई मगर देखा कि दूसरे लड़के का भी पता नहीं। फिर छाती पीटने लगी। …

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