Chand – Ajay

गंगा की शांत सतह पे वो एकादसी का चंद्रमा
घाटों पे लगा वो नौंको का डेरा
सीढ़ियों पे बैठे हम भी कुछ शांत से ही है
लेकिन मन को है पानी के लथेड़ों ने घेरा
मेरा मन भी है गंगा की गहराइयां लिए
बाते बहुत सी दबी है अंगड़ाइयाँ लिए…
मैं भी वो चाँद होना चाहता हूँ ,
खुला आसमान होना चाहता हूँ ,
फिर मन में एक ख्याल आया कि
चाँद भी तो है आकाश में तनहाइयाँ लिए ।
दूर उस पार एक छोटी सी रोशनी नज़र आ रही है
धुंध के बीच कुछ धुंधली सी नज़र आ रही है
फिर भी बार-बार नज़रे वही जा रहीं है
क्योंकि वही तो एक चीज़ है
जो उस पार से भी अँधेरो को चीरती हुई आ रही है ।
शायद ये रोशनी होना ही सही होगा
गम रूपी अँधेरो को चीरना ही सही होगा
चाँद से उसकी चाँदनी को उधार लेके
सितारों में खुद को खोजना ही सही होगा ।

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