Hindi kahani with moral values prernadayak

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Hello readers , welcome to onlinehindistory.com once again. Today we are here with fresh 3 new hindi kahani with morals for you people. So read and them and don’t forget to tell us your views in comment section.

1. एक शहीद का परिवार Emotional Hindi kahani

जीवन और मरण यही तो सच्चाई है दुनिया का. कुछ नहीं कर पाते इस जीवन का. हलचल भरा यह जीवन एकदम शांत हो जाता है. यह ना तो किसी को आने की खबर देती है न समझने का मौका. न आगे का भविष्य देखता है और ना पीछे छूटे परिवार. रोते-बिलखते बूढ़े माँ-बाप, चूड़ियाँ तोड़ती जवान बीवी और वह बच्चा जिसको अपने पापा का नाम भी नहीं पता.

जो बड़ा होकर केवल दिवाल पर लगी तस्वीर देख पायेगा.

एक चहकती हुई जिन्दगी 2 पल में एक सुनसान रेगिस्तान बन गया. जिसपर कितना ही बरसात हो जाये सुखा ही रहेगा. ना तो सावन उस पर मरहम लगा पायेगा और ना ही दो पल के लिए आने वाले मुसाफिर.

True story – शहीद के माता-पिता का हाल

बूढी हो चुकी माँ, दरवाजे पर निगाहे गड़ाये बैठी है, आखें देख नहीं पा रही है, दिल मान नहीं रहा है, इसी रास्ते तो आता है वह. जरुर आएगा. ऐसे कैसे चला जाएगा अपनी माँ को छोड़ कर. यही तो आता था. माँ-माँ कह कर गले से चिपक जाता था. तो अब क्यों नहीं आ रहा. कहाँ है मेरा बच्चा. माँ हूँ न मैं पहले मेरे पास ही आएगा. आँखों से टपकती धारा कलेजे को पिस रहा है. कौन समझता उस बूढी मा को अब कभी नहीं आएगा वो.

आंसू को अंदर ही पिने वाला बाप का सीना फटा जा रहा है.

हिलते डंडे का सहारे चलते बाप. अपने बुढ़ापे की लाठी खो दी. जिसके कंधे पर जाने की आस थी उसे कन्धा देना पड़ा. कहाँ है वो जो बोलता था मैं हूँ पापा आपके का सहारा. जो मेरा सीना था, जो मेरा हिम्मत था, ताकत था सब ले गया. क्या करू इस शारीर का. ना घर में रो सकता और ना बाहर रह सकता. कभी घर में आते है कभी बाहर जाते है. क्या ढूंड रहे वह पता नहीं. लडखडाती लाठी और लडखडाते पैर शरीर जर्जर.

चलने की हिम्मत नहीं रह गई.

पागल हुई पत्नी

तस्वीर को निहारती पत्नी. एक जिन्दा लाश है. सारे सपने, सपने हो गये. ना वर्तमान का पता, ना भविष्य का. अँधेरा ही अँधेरा हो गया. कितने सपने देखे थे साथ में. अपने साथ ले जाने का भी तो वादा किया था. तो क्यों अकेला छोड़ चले गये. किसके सहारे? एक पल तो जी किया आपके चिता पर बैठ मैं भी सती हो जाऊ. आप ही नहीं रहे तो मेरा क्या अस्तित्व”. उसके आँखों से निकलती आसुंओ की गंगा जो कभी सूखती ही नहीं. जिसकी सुन्दरता की चर्चा पुरे गावं में थी आज वह पगली की वेश में है. ना बाल सवारने का सुध, ना कपडे की सुध. जैसे कितने ही दिन से बदला ही नहीं गया हो.

इतने सजने-सवरने वाली, बिलकुल ही निसहाय अवस्था में थी.

देशभक्ति का जूनून

आज विक्रांत को शहीद हुए 1 महीने हो गये. मेरा सबसे खास दोस्त. दोस्ती ऐसी ऐसी की अपना सब बात share करता था. आज मैं उसके घर आया था. घर नहीं अब तो एक सुनसान माकन हो गया था. घर में अब किसी चीज की सुध नहीं है. किसी को अपने शरीर का होश नहीं है घर और समान का क्या हो. एक ही तो लड़का था उनका. सभी का प्यारा! घर का, गावं का. वह अपने परिस्थिति के बारे में हमेशा बात करता था. किस पारिस्थि में वहाँ रहते है.

वह CRPF में देश के सेवा के लिए छतीसगढ़ में तैनात था. भुत सवार था देशभक्ति का. कोई और नौकरी करना ही नहीं चाहता था. बस फ़ौज में जाना है और देश सेवा करना है. देश को भ्रस्टाचार से मुक्त करना है. आतंकवाद को रोकना है. बस यही रहता था उसके दिमाग में.

मगर क्या हुआ?

क्या हुआ उस शहादत का? सब हवा में गुम! कौन जनता है अब इस शहादत को माँ-बाप और बीवी के अलावा? कोई पूछने वाला तक तो नहीं घर में रोटी है या नहीं?

अपने न्यूज़ की टीरापी बढ़नी वाली न्यूज़ कंपनियां. अब उनको इस में कोई रूचि नहीं.

देश भक्ति की गीत गाने वाले नेता, मंत्री अब किसी के पास जाने पर भी नहीं पहचानता.

सरकार के तरफ से मिलने वाली मदद पता नहीं किस फाइल में गूम हो गई.

कौन चक्कर लगाये इस ऑफिस का बूढ़े माँ-बाप या बीवी.

होली के दिन मातम

मैं इन ध्यानो में खोया था तभी भाभी चाय बना कर लाई. उसका बच्चा मेरी गोद में था. मैं चाय लिया और फिर उन्ही यादों में खोने लगा. होली का दिन था. पूरी दुनियाँ रंगो में डूबी है थी. सभी अपने-अपने तरीके से रंग का आनंद ले रहे थे. मैं विक्रांत के घर ही था. पकवान बन रहे थे. घर के बाहर लड़के DJ बजा रहे थे. तभी विक्रांत के घर call आया. शोरगुल के चलते सुनाई नहीं दे रहा था. कुछ देर बाद call विक्रांत की पत्नी ने उठाया. कुछ देर बात करने के बाद उसने मुझे फ़ोन दे दिया. मैं फ़ोन लिया और कानो से लगाया –“क्या आप विक्रांत के दोस्त है?” उधर से किसी ने पूछा

“जी, मैं विक्रांत का दोस्त हूँ.” मैंने जवाब दिया. मुझे अभी भी समझ में नहीं आ रहा था कौन है और कहना क्या चाह रहा है. उसने फिर बोला – “कल सुकमा में नक्सल अटैक में विक्रांत शहीद हो गये.”…………….” और क्या कहा उसने पता नहीं. दिमाग सुन हो गया……मैं एक तरफ गिर पड़ा….mobile दुसरे तरफ. कैसे बताये? किसे बताये इस बात को?

Hindi kahani किसको फर्क पड़ा इस शहादत का ?

मैंने टीवी on किया. उसमे न्यूज़ फ़्लैश होने लगे. सभी शहीदों का नाम, फोटो आने लगा. पुरे घर में हाहाकार मच गया. जो सुनता वही गिर पड़ता. किसी को होश नहीं था. आग की तरह पुरे गावं में फ़ैल गया. साउंड बंद हो गया. पूरा गावं उमड़ पड़ा. कोई पत्नी को सम्भलता तो कोई माँ-बाप को. कोई बेहोश पत्नी को पानी देता तो कोई दहार मरकर रोते पिता को.

आज होली थी पूरी दुनियाँ होली में व्यस्त थी बस कुछ घरो को छोड़कर.

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2. माँ और बेटे की Emotional story in hindi

यह एक माँ और छोटे बेटे की story है. जो रात भर बारिश में कैसे बिताते है. बहुत ही heart touching stories है. आपको जरुर पंड आएगी.

“माँ तू कब खायेगी? तू भी कुछ खा ले” अपनी माँ को बैठे देखा तो मैंने पूछ लिया.

“मैं भी खा लुंगी बेटा. तू सो जा. बहुत तेज बारिश हो रहा है.” वह मुझे सुलाती हुई बोली.

“तू खायेगी भी नहीं और सोएगी भी नहीं, खाना नहीं बचा है क्या?”

“बच्चा है न बेटा, अभी तो बहुत ही खाना बचा है. तू सो जा फिर मैं खा लेती हूँ.” उन्होंने मुझे फिर से चादर ओढ़ाते हुए बोली.

मेरे भी आँखों से नींद बहुत दूर था. मुझे पता था रात में खाना बना नहीं था. मैं भी सुबह का ही खाया था. और अब खाना बचा ही नहीं था. काली रात में, घनघोर बरसात हो रहा था. बिजली ऐसे तडपती जैसे यही गिरने वाली हो. छप्पर के घर में हम दो ही थे. मैं और मेरी माँ. उस अकेला कमरा में अकेला खाट था जिस पर हम माँ बेटे सोते थे.

नींद नही आई heart touching stories

मैंने चादर से मुहँ निकलकर देखा माँ अभी भी मेरे पैरो के पास बैठी थी. मेरे पास में ही एक बड़ा सा कटोरा रखा था. जिसमे ‘टप..टप.’ कर के पानी टपक रहा था. पानी टपकने से आधे बिस्तर भींग गया था बस आधा ही बचा था. जिसके चलते एक कोई सो सकता था. बस ‘एक ही’. माँ ने मुझे सुला दिया था और खुद ही पैरो के पास बैठी रही.

“माँ मुझे नींद नहीं आ रही है.” मैंने उठते हुए कहा.

“क्या हुआ बेटा. पानी आ रहा है क्या?” वह चारो तरफ बिछावन को छूने लगी. शायद बिछावन गिला हो गया. हो. “पापा हर साल छप्पर ठिक करते है फिर भी पानी कैसे आने लगता है.” मैं अपन छोटे से दिमाग में सोचते हुए पूछा. “कही-कही छुट जाता है न बेटा और तेज बसिष में रिसने लगता है.” “पापा इसको पक्का का क्यों नहीं बना देते. सभी का भर पक्का का है हमारा घर ही छप्पर का है.” मैं उसके गोद में सोते होए बोला. तेज आंधियो से दीये बुझ चुके थे. चारो तरफ अँधेरा-ही-अँधेरा था. मगर आज डर बिलकुल नहीं लग रहा था. जब भी मैं माँ के पास रहता हूँ. पता नहीं डर क्यों नहीं लगता. भुत आयेंगे तो क्या हुआ “माँ” है न.

जब तक माँ है किसी का डर नहीं है. कितना भी अँधेरा हो.

डर नही लगा

“माँ मैं बड़ा होऊंगा न तो बड़ा-सा घर बनाऊंगा. कितना भी बारिश हो तो पानी नहीं टपकेगा.”

मैं आराम से माँ के गोद से सोते हुए बोला.

“हां मेरा राजा बेटा बड़ा-सा घर बनाएगा. मगर पढ़ेगा तब न. खूब मन लगा कर पढो.” वह मुझे पीठ पर हल्की-हल्की थपकी दे रही थी.

“मै खूब पढूंगा और बड़ा-सा नौकरी करूँगा.

और खूब पैसे कमाऊंगा.”

फिर मै कब नींद की गोद में चला गया पता ही नहीं चला. रात भर आधियाँ-तूफान चलती रही. तेज घनघोर बारिश रात भर होता रहा.

माँ ने वैसे बैठ कर रात गुजार दिया. बिना कुछ खाए-बिना सोये.

3. बूढ़े माँ बाप की कहानी

आप लोग को एक social story दिया जा रहा है. आज यह हर घर में हो गया है. कोई अपने बूढ़े माँ बाप को सहारा नही दे रहा है वो कैसे जी रहे है उनको क्या चाहिए किसी को ध्यान नहीं है. सब अपने लाइफ में busy है. एक छोटी सी social story उसी के बारे में है. “अरे घर में कोई है या नहीं! आवाज दे-दे कर थक गया. कोई आता क्यों नहीं मेरे पास. एक लोटा पानी तो दे जाओ कोई. प्यास से जान निकली जा रही है.” मैं अपनी चौकी पर बैठे-बैठे ये 5वीं बार आवाज लगा दी. मगर अभी तक कोई आया नहीं. मन अंदर-अंदर गुस्से से भर गया. उठ कर सबको कुछ भला-बुरा सुना दूँ.

ये एक लोटा पानी नहीं दे सकते मुझे.

मैंने अपनी बुढ़ापे से ग्रस्त शारीर को उठाने की कोशिश की मगर हाथ सहारा नहीं दिया और फिर वैसे ही लेट गया. सिरहाने ही पड़ी अपनी डंडे को पकड़ा और उठने का प्रयास किया. – “डंडा” मेरा बांस का 6 फिट का डंडा. यही तो अब सहारा है इस बुढ़ापे का. बेटे-बेटी तो बस जवानी के लिए है बुढ़ापे में कोई साथ नहीं देता. हिलते हाथ के साथ डंडा भी हिलने लगा. मैं धीरे-धीरे उठने का प्रयास करने लगा.

बेचारा ‘डंडा’ – मेरे कारण यह भी हिल रहा है. – जो की हमेशा शांत खड़ा ही रहता है.

Motivational stories in hindi

social story“क्या दिन भर बक-बक करते रहते हो. आराम से बैठा नहीं जाता तुमसे. हर समय तुमको तरास ही लगा रहता है. ये लो पानी पी लो.” मेरे बड़े बेटे रामू की बीबी पानी भरे लोटे को ऐसे जमीन पर रखी उसमे से आधा पानी जमीं पर ही गिर पड़ा. “इतनी गर्मी है, प्यास तो लगेगा ही. देख रही हो पसीने से पूरा बिछावन गिला हो गया. है.” लाठी के सहारे अब चौकी पर बैठ गया था. पानी लेने के लिए अब भी नीचे झुकना था. चौकी भी इतना ऊचा कर दिया है की उतरना महाभारत ही है. फिर भी अपने डंडे के सहारे उतरा और पानी लेते हुए बोला – “थोड़ा गुड मिल जाता तो अच्छा होता. गर्मी में ऐसे ही पानी नहीं पीना चाहिए.”

मैंने मुह पर दया के भाव दिखाते हुए बिना दातों के मुस्कारते हुए बोला.

“करनी-धरनी कुछ है नहीं बस बैठ कर आदेश देना है. कभी ये लाओ कभी वो लाओ.”

बुदबुदाते हुए वह अंदर चली गई.

मैं पानी को हाथ में लिए बैठा था. क्या करू पी जाऊ या अभी और 10 बार पुकारू.

उस से अच्छा है. “गट गट गट….” पुरे पानी एक ही घुट में अंदर तक उतार दिया.

Social hindi kahani – बुढ़ापे में कोई नही पूछता

ये गर्मी भी न. और ये ‘बुढ़ापा’…भार बना देती है दुसरे पर. नहीं तो यही गर्मी में दिन-दिन भर खेत में काम करते रहते थे. कुछ नहीं हुआ आजतक. काम को काम समझा ही नहीं आज तक. गावं में ऐसे ही सब थोड़े कहते थे. – उसमे कोई जिन्न है क्या? काम को ख़त्म किये बिना छोड़ता ही नहीं है. और अब! अब तो अपना शरीर सभालना मुश्किल हो गया. भार हो गया. बेटे पर, परिवार पर. इसी रामू का शादी कितने धूम-धाम से किया था. सारे गावं वाले देखते रह गए थे.

“क्या हुआ क्यों इतना चिल्ला रही हो” रामू ने अपनी पत्नी से पूछा.

“वही तुम्हारा बाप, उसे हमेशा कुछ न कुछ चाहिए ही होता है. कभी ये कभी वो. मैं तो उस से तंग आ गई हूँ.” वह अभी भी जोर जोर से चिल्ला रही थी. “सभी के मरने के समय आता है इसका पता नहीं कब आएगा.

‘बुढ्ढा’ पता नहीं किस जन्म का बदला ले रहा है.

मरता भी नहीं.”

“धीरे-धीरे बोलो बाबूजी सुन लेंगे.”

“सुन ले इसीलिए तो बोल रही हूँ. उसको कुछ काम- वाम तो है नहीं बस बैठ कर फरमाइश करते रहता है. जैसे नौकर रखा है. वो मर गई. और इसको छोड़ गई.

इसको पता नहीं कब मरना है.”

बुढ़ापे में छोड़ कर चली गई

“वो मर गई. हमे भी तो अपने साथ ले जाती. हमे छोड़ दिया है. इस नरक में.” मेरे इस ख़राब हो चले आँखों में उसका चित्र बनने लगा. आकर बैठे नहीं की गुड और पानी लेकर आ जाती. अपने पैरो के दर्द को कभी नहीं समझा. जब भी जो बोलता एक बार में ले कर चली आती. बिना खिलाये कभी भी खाना नहीं खाया. औरत नहीं लक्ष्मी थी – ‘लक्ष्मी’. सच में ‘वो चली गई. मगर मुझे क्यों छोड गई अकेला. मुझे भी अपने साथ ले जाती तो आज ये दिन न देखने पड़ते. आ कर देख लो तुम्हारे ही बेटो ने मेरा क्या हाल बना रखा है.

आँखों से दो बूंद गिरे और पसीने में साथ मिल गए.

कोई नहीं देखा न इस दर्द को न इस आंसू को. मैंने भी करवट ली और पंखा हिलाने लगा.

और मन में सोचने लगा “बुढ़ापे का सहारा कौन?”

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