अपनों की कीमत – Mata Pita Ki Seva

माता पिता की सेवा जरुरी है

“एक बार जरुर पढे” कहानी –

पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा….

छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया…

अब फाइनल इंटरव्यू कंपनी के डायरेक्टर को लेना था…

और डायरेक्टर को ही तय करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं…

डायरेक्टर ने छात्र का सीवी (curricular vitae) देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ यह छात्र ईसी (extra curricular activities) में भी हमेशा अव्वल रहा…

डायरेक्टर- “क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान कभी छात्रवृत्ति (scholarship) मिली…?”

छात्र- “जी नहीं…”

डायरेक्टर- “इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे..”

छात्र- “जी हाँ , श्रीमान ।”

डायरेक्टर- “तुम्हारे पिताजी क्या काम करते है?”

छात्र- “जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं…”

यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- “ज़रा अपने हाथ तो दिखाना…”

छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे…

डायरेक्टर- “क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की…?”

छात्र- “जी नहीं, मेरे पिता हमेशा यही चाहते थे कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें पढ़ूं…

हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं…”

डायरेक्टर- “क्या मैं तुम्हें एक काम कह सकता हूं…?”

छात्र- “जी, आदेश कीजिए…”

डायरेक्टर- “आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना…फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना…”

छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया… उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है,

तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है…

छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा…

पिता को थोड़ी हैरानी हुई…लेकिन फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए…

छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया। कुछ देर में ही हाथ धोने के साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे…

पिता के हाथ रेगमाल (emery paper) की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे…

यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था…।

छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे…

पिता के हाथ …

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एक घायल पक्षी की आत्मकथा – Ak Ghayal Pakshi Ki Atmakatha

 नमस्कार दोस्तों आपका दिल से स्वागत हे तो आज हम एक घायल पक्षी की आत्मकथा के बारे में बात करने वाले हे कैसे वो पक्षी घायल होता हे कैसे वो पहले और अब ज़िन्दगी को बिताता हे उसने क्या – क्या सपने देखे थे और क्या हो गया ये सब हम इस पोस्ट के माध्यम से आपको बताने वाले हे हमें उम्मीद हे की आपको ये पोस्ट जरूर पसंद होगी। 

एक घायल पक्षी की आत्मकथा

 प्रस्तावना : 

           जी हां दोस्तों में एक घायल पक्षी हु आज जो मेरा ये हाल हे उसके पीछे एक शरारती लडके का हाथ हे उसकी एक छोटी सी भूल की वजह से मेरा ये हाल हे मेरे पंख जो मुझे बहुत ही प्यारे थे वो ही आज मेरे पास नहीं हे मेरे शरीर से खून बह रहा हे पता नहीं कब मेरी मौत हो जाये और में इस पीड़ा से आज़ाद हो जाऊ इसलिए में मरने से पहले में आपको अपने बारे में आपको बताना चाहता हु।

मेरा बचपन : 

  मेरे बचपन के दिन बहुत ही सुहाने थे एक बड़ा सा बरगद के पेड़ पर हमारा घोंसला था जिसमे मेरे छोटे भाई – बहन और में रहते थे यानिकि मेरा परिवार बहुत छोटा था मेरे माँ हमें छोड़कर दाने लेने जाती हम तीनो भाई – बहन अपनी माँ की राह देखते और उसके वापस आते देखकर हमारी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। हम अपनी – अपनी चोंच खोल देते और माँ उसमे दाने डालती उसी प्रकार हर दिन माँ हमारे लिए दाने लेने जाती और हमारा भरण पोषण करती इसी प्रकार दिन बीतते गए और हम बड़े होते गए। 

मेरे सुनहरे पल 

  जब हम बड़े हुए तो हमारी भी इच्छा हुई उड़ने की तो माँ ने हमको उड़ना सिखाया तब में और मेरे भाई बहन शरुआत में एक डाल से दूसरी डाली पर जाते कभी कभी गिर भी जाते थे ऐसे कर कर के हमने उड़ना सिख लिए अब हम ऊँची आकाश में उड़ सकते हे किसी भी पेड़ पर आसानी से बैठ सकते हे यानिकि उड़ने हम माहिर हो गए थे।

अब हम तीनो भाई – बहन दूर – दूर की सैर करने लगे। मनचाहे पेड़ो पर बैठकर मनचाहे फल खाते बड़े और ऊँचे झरनों का मीठा पानी पीते मौज मस्ती करते ये मेरे जीवन के सुनहरे दिन थे। 

मेरा घायल होना 

  एक दिन की बात हे हम दिनों भाई – बहन हर दिन की तरह सैर करने गए थे अपने मनचाहे फल …

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कोई भूख के लिए खाता है तो कोई सेल्फी के लिए – Hindi Kahani on Modern Society

मैं हिमाचल के धर्मशाला शहर में रहता हूँ. जिन लोगों को नहीं पता, उन्हें बता दू कि धर्मशाला एक टूरिस्ट प्लेस है. क्यूंकि यहाँ का मौसम काफी ठंडा है, हर साल गर्मियों में लाखों लोग यहाँ घूमने आते है. मेरे घर के पास एक कैफ़े ( Cafe ) है जहाँ मैंने अक्सर कॉफ़ी या जूस पीने जाता हूँ और साथ में अपना लैपटॉप भी ले जाता हूँ ताकि कोई नयी कहानी लिख सकू, काफी शांत जगह पर बना है ये कैफ़े.

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Hindi Kahani on Modern Society

एक दिन शाम के वक़्त मैं उसी कैफ़े में गया और कैफ़े के बाहर एक टेबल पर बैठ कर कॉफ़ी पीते पीते कुछ सोच रहा था कि कही से 2 लड़का और लड़की मेरे पास आये और पैसे मांगने लगे. देख कर लग रहा था कि वो दोनों भाई बहन है, उनके कपडे काफी गंदे थे. हमारे यहाँ धर्मशाला में अक्सर ऐसे मांगने वाले आते रहते है. मैंने पैसे देने को मना कर दिया और उन्हें इग्नोर कर दिया। फिर भी 1 मिनट तक वो मुझसे मांगते रहे लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया.

कुछ समय बाद वो दोनों सड़क पर आते जाते लोगो से पैसे मांगने लगे. उन्हें 2 मिनट तक देखने के बाद मैंने उन्हें आवाज़ लगायी और अपने पास बुलाया.

“मैं पैसे तो नहीं दूंगा लेकिन अगर भूख लगी है तो कुछ खिला देता हूँ” मैंने उन दोनों को कहा.

उन्होंने कैफ़े में लगी मसाला डोसा की तस्वीर की तरफ इशारा किया। मैंने उन्हें कहा जाओ, आर्डर कर दो, मैं पैसे दे दूंगा. जैसे ही उनका मसाला डोसा आया उन्होंने महज़ 2 मिनट में खा लिया। मैंने आज तक इतना भूखा किसी को नहीं देखा था, उन पर दया आ रही थी. “यकीनन उन्होंने काफी देर से कुछ नहीं खाया होगा …..अच्छा किया जो इन बेचारो को खिला दिया ” मैंने मन ही मन सोचा और अपने लैपटॉप पर कुछ लिखना शुरू कर दिया.

दो मिनट बाद मेरा ध्यान सामने से आ रही तीन लड़कियों पर गया. एक दम मॉडर्न लड़कियां, अपने अपने हाथ में iPhone पकडे हुए कैफ़े की तरफ आ रही थी. करीब 15 से 16 साल की लग रही थे वे तीनो लड़कियां और उन्हें देख कर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता था कि वे काफी अमीर घर से है.

“भईया….2 पास्ता, एक स्माल पिज़्ज़ा और तीन ऑरेंज जूस” उन लड़कियों में से एक ने कैफ़े के वेटर को आर्डर किया. मैं उन्हें देख नहीं रहा था लेकिन मेरा …

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अंधेरे में : निर्मल वर्मा की कहानी | Andhere Mein Hindi Story Nirmal Verma

अंधेरे में निर्मल वर्मा की कहानी (Andhere Mein Story By Nirmal Verma) Andhere Mein Nirmal Verma Ki Kahani

Andhere Mein Story By Nirmal Verma

बीच की तीन पगडंडियों को पार कर बानो आती थी। आते ही पूछती थी, “कुछ पता चला?” मेरा मन झूठ बोलने के लिए मचल उठता। सोचता, कह दूं – “हाँ, पता चल गया..हम दिल्ली जा रहे हैं।“ लेकिन बानो झूठ ताड़ जाएगी, इसलिए आँखें मूंदे रहता।

बानो मेरे माथे पर हाथ रखती। जब उसका हाथ ठंडा लगता, मैं जान जाता कि अभी बुखार है, जब गरम लगता तो मन उल्लसित हो उठता।

आँखें खोलकर पूछता – “कैसा लगता है बानो?”

और बानो निराशा भरे स्वर में कहती, “अभी तो कम है, लेकिन शाम तक जरूर चढ़ जायेगा।”

बानो समझती थी कि जब तक बुखार रहेगा, हम उसके संग शिमले में ही रहेंगे। बुखार उतरने लगता, तो उसे निराशा होती। जब कभी बानो की आहट मिल जाती, मैं जानबूझकर पास रखे ठंडे पानी से अपना माथा रगड़ लेता। जब वह आती, तो उसका हाथ अपने माथे पर रखकर पूछता, “देखो तो बानो, कितना ठंडा है।“

बानो गुमसुम-सी खिड़की के बाहर देखती रहती।

खिड़की के बाहर नीले जंगल हैं; ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ है; पेड़ों के घने झुरमुट हैं। जब हवा का झोंका परदे को ढुलाता हुआ भीतर आता है, दूर दिगंत की एक स्वप्निल-सी खूशबू कमरे में बिखर जाती है।

“इन पहाड़ों के पीछे दिल्ली है। है न बानो?” मैं पूछता।

बानो ने चुपचाप सिर हिला दिया। उसे दिल्ली की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। कभी-कभी मुझे उस पर काफी तरस आता। उस बेचारी ने अब तक दिल्ली नहीं देखी थी। उसके अब्बा का दफ्तर बारहों महीने शिमले रहता था।

“मैं आज गयी थी-अपने घर।” बानो ने कहा। जिस ‘अपने घर’ का नाम सुनकर मैं सबकुछ भूल जाता था, आज उसके प्रति मेरे मन में कोई उत्सुकता नहीं जगी।

“मेरे अलूचे तुम ले लेना…बानो।” मैं आँखें मूंदे लेटा रहा।

“तुम्हारे गले-सड़े अलूचे कौन खायेगा। जब दिल्ली जाओगे, अपनी पोटली में बांधकर ले जाना।“ बानो खीजकर बाहर बरामदे में भाग गयी।

मुझे गुस्सा लगा। लेकिन बीमारी में गुस्सा भी टूटा-फूटा आता है, कोई भी भाव अंत तक नहीं पहुँच पाता, बीच रास्ते में ही सूख जाता है। जब रोने को जी करता है, तो रोना नहीं आता, आँखें ही बिफरी-सी रह जाती हैं। जब खुशी होती है, तो दिल तेजी से नहीं धड़कता, केवल होंठ कांपकर रह जाते हैं।

इन दिनों मेरे कमरे में आने से पहले बानो की …

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आदमी और लड़की निर्मल वर्मा की कहानी | Aadmi Aur Ladki Hindi Story By Nirmal Verma

प्रस्तुत है – आदमी और लड़की निर्मल वर्मा की कहानी (Aadmi Aur Ladki Story By Nirmal VermaAadmi Aur Ladki Nirmal Verma Ki Kahani एक उम्रदराज़ विवाहित व्यक्ति और एक कमउम्र लड़की के प्रेमसंबंधों के उतार-चढ़ाव को चित्रित करती है. पढ़िए :

Aadmi Aur Ladki Story By Nirmal Verma

उसने दुकान का दरवाज़ा खोला, तो घंटी की आवाज़ हुई-टन। जब वह भीतर आया और दरवाज़ा मुड़कर देहरी से दोबारा सट गया; तो घंटी दोबारा बजी, इस दफ़ा दो बार-टन, टन।

यह दूसरी आवाज़ काफ़ी देर तक गूंजती रही। यह चेतावनी थी कि कोई भीतर आया है।

दुकान में कोई नहीं था। उसे हमेशा लगता था कि यदि वह शेल्फ़ से दो-चार किताबें उठा कर भाग जाये, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। यह उसका भ्रम था। घंटी बजते ही काउंटर के पीछे दो आँखें उसे अनजाने में ही पकड़ लेती थीं-आँखें, जो नीली थीं और गीली भी। ऐनक के पीछे दो डबडबाये धब्बे उसे निहार रहे थे।

वह किताबों की अलमारियों के बीच रास्ता टटोलता हुआ काउंटर के सामने आ खड़ा हुआ।

‘क्या हाल हैं?’ उसने पूछा।

अधेड़ मैनेजर ने उसकी ओर देखा; फिर कंधे उचका दिये, जिससे कुछ पता नहीं चला कि वह कैसे मूड में है।

‘सर्दी शुरू हो चली है।’ उसने कहा। मौसम का ख़याल अचानक उसे मैनेजर की मूंछें देखने पर हो आया था, जो इतनी सफ़ेद थीं, मानो अभी-अभी उन पर ताज़ा बर्फ़ गिरी हो।

‘होगी ही।’ बूढ़े ने तटस्थ भाव से कहा, ‘अक्टूबर का महीना है।’

‘अभी हीटिंग शुरू नहीं हुई?’

‘नवंबर से पहले नहीं, चाहे बर्फ़ ही क्यों न गिरने लगे।’ बूढ़ा बहुत ही महीन भाव से सरकार पर कटाक्ष करता था। मुद्दत पहले वह दुकान का मालिक था, अब नये तंत्र के नीचे, सरकार उसकी मालिक थी, उन किताबों की भी-जो उसके बाप-दादाओं ने पहली लड़ाई के ज़माने से जमा की थीं। दुकान वही थी, लेकिन रातों-रात क़ानून की लकीर उसके और बाप-दादा की विरासत के बीच एक खाई-सी खोल गई थी। काउंटर पर वह अब भी बैठता था-पहले की तरह। लेकिन अब किताबों से उसका रिश्ता कुछ वैसा ही था, जैसे कोई बाप जीते-जी अपने बच्चों को अनाथालय में देखता है।

‘आप सोचते हैं, क्या बर्फ़ गिरेगी?’ आदमी ने पूछा।

बूढ़े ने ऐनक उतारी, मैले रूमाल से शीशे साफ़ किये, फिर नाक सिनकी, ‘बर्फ़ और मौत घंटी बजा कर नहीं आती।’

उसे लगा, जैसे बूढ़े का इशारा उसकी तरफ़ है। पिछले दिनों जब कभी वह दुकान की घंटी …

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वो जो दबी सी आस बाकी है….Love Breakup Bewafai Zindagi !

Bewafai Story in Hindi

मेरा नाम अनु है और ये बात है 4 साल पहले की, मेरी नयी-नयी शादी हुई थी. वैसे तो मेरी arranged marriage थी लेकिन शादी से पहले मेरा एक बॉयफ्रेंड भी था जिसे मैं बहुत प्यार करती थी, उसका नाम अर्जुन था. शादी के बाद अभी एक महीना ही हुआ था कि मेरे पुराने बॉयफ्रेंड को मेरे ही ऑफिस में नौकरी मिल गयी. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा क्यूंकि मेरी शादी हो चुकी थी लेकिन फिर भी पता नहीं मुझे क्या सूझा कि मैंने अर्जुन से बात करनी शुरू कर दी, आखिर हम एक ही ऑफिस में तो थे.

एक दिन मैं ऑफिस के वाशरूम से निकल रही थी कि सामने अर्जुन खड़ा था, वो मेरे करीब आया, आँखों में आँखे डाले मुझे घूर रहा था, वो मेरे और करीब आया और हमने एक दुसरे को Kiss की. उस वक़्त पता नहीं मुझे क्या हो गया था, मैं शायद भूल गयी थी कि मैं शादीशुदा हूँ. कुछ देर इंटिमेट होने के बाद मुझे थोड़ा होश आया और मैंने अर्जुन को एकदम से अपने से दूर धक्का दिया और जा कर अपना काम करने लगी.

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अर्जुन ने मुझे बहुत समझाया लेकिन मुझे पता था कि शादी के बाद ये गलत है. मुझे इस बात का इतना अफ़सोस हुआ कि मैंने नौकरी छोड़ दी और फिर कभी ऑफिस नहीं गयी.

मुझे ये बात अंदर ही अंदर खाये जा रही थी कि मैंने अपने पति जिसका नाम रोहित है उसके साथ धोखा किया. मैंने शादी के बाद एक दुसरे मर्द के साथ सम्बन्ध बनाये और यही बात मुझे दिन रात परेशान कर रही थी. यूँही 2 महीने बीत गए, मुझे ऑफिस छोड़े अब 2 महीने होने को आये थे और मैंने सोचा क्यों ना मैंने अपने पति (रोहित) को सब सच सच बता दू.

मैंने ठीक समय देख कर रोहित को सब बता दिया. उस दिन रोहित शाम को ऑफिस से घर आये थे, मैं डरी हुई थी लेकिन फिर भी हिम्मत करके उसे कहा “रोहित मुझे माफ़ कर दो”

रोहित: अनु… किस बात की माफ़ी?

वो, मैंने शादी के बाद भी एक लड़के के करीब आ गयी थी लेकिन वो सब एक गलती थी और मैं तुमसे माफ़ी मांगती हूँ. मैं तुम्हे यकीन दिलाती हूँ कि कभी फिर ऐसा नहीं होगा.

रोहित: तुमने मेरे साथ धोखा किया है अनु, मैं घर छोड़ कर जा रहा हूँ।

“नहीं रोहित, प्लीज ऐसा मत करो, वो सिर्फ एक गलती थी, …

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मोहब्बत की पहचान : कृष्ण चंदर की कहानी | Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Short Story

प्रस्तुत है मोहब्बत की पहचान कृष्ण चंदर की कहानी (Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Ki Kahani) Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Short Story दो मोहब्बत करने वालों के अहम् के टकराव की कहानी है. क्या अहम् दोनों के बीच की मोहब्बत खत्म कर देगी. पढ़िये : 

Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Ki Kahani

Mohabbat Ki Pehchan Krishan Chander Ki Kahani

पहले दिन जब उसने वक़ार को देखा, तो वो उसे देखती ही रह गई थी। अस्मा की पार्टी में किसी ने उसे मिलवाया था। “इनसे मिलो, ये वक़ार हैं।” वक़ार उसके लिए मुकम्मल अजनबी था, मगर उस अजनबीपन में एक अजीब सी जान-पहचान थी। जैसे बरसों या शायद सदियों के बाद आज वो दोनों मिले हों, और किसी एक ही भूली हुई बात को याद करने की कोशिश कर रहे हों।

दूसरी बार शाहिदा की कॉफ़ी पार्टी में मुलाक़ात हुई थी, और इस बार भी बज़ाहिर उस बेगानगी के अंदर वही यग़ानगत उन दोनों को महसूस हो रही थी। ये पहली निगाह वाली मुहब्बत नहीं थी। एक अजीब सी क़ुरबत और गहरी जान पहचान का एहसास था, जो दोनों के दिलों में उमड़ रहा था, जैसे बहुत पहले वो कहीं मिले हैं। बहुत लंबी-लंबी बहसें की हैं।

आदात, ख़यालात और ज़ाती पसंद के ताने-बाने पर एक-दूसरे को परखा है। वो दोनों एक-दूसरे के हाथ की गर्मी को जानते हैं। उस बर्क़ी रौ को पहचानते हैं, जो निगाहों ही निगाहों में एक-दूसरे को देखते ही दौड़ने लगती है। वो डोर जो दिल ही दिल में अंदर बंध जाती है और एक-दूसरे से अलग होने के बाद अपने-अपने घरों में अलग-अलग, अपने-अपने कमरों में अकेले आराम, सुकून और चैन से बैठे हुए भी यूं महसूस होती है, जैसे वो डोर हिल रही है।

एक ही समय में वक़्त और एहसास के एक ही सानहे में वो दोनों एक-दूसरे को याद कर रहे हैं। रात की तन्हाई में अज़्रा को अपने बिस्तर पर अकेले लेटे-लेटे एकदम एहसास हुआ, जैसे उसके बहुत ही क़रीब उसके चेहरे पर वक़ार झुका हुआ है। घबराकर उसने बेड स्विच दबा कर रौशनी की। कमरे में कोई न था। फिर भी वो घबरा-सी गई। लजा सी गई। उस एक लम्हे में ऐसा महसूस हुआ, जैसे उसका राज़ वक़ार को मालूम हो गया। तीसरी बार जब वक़ार से रऊफ़ की दावत पर मिली, तो बेइख़तियार उसकी आँखें झुक गईं और रुख़्सारों पे रंग आ गया। मुहब्बत करने वाली औरत का दिल बहुत शफ़्फ़ाफ़ होता है।

वक़ार और अज़्रा को एक-दूसरे के क़रीब आते ज़्यादा देर नहीं लगी। …

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जुड़वा भाई मुंशी प्रेमचंद की कहानी

प्रस्तुत है -जुड़वा भाई मुंशी प्रेमचंद की कहानी (Judwan Bhai Munshi Premchand Ki Kahani) Judwan Bhai Short Story By Munshi Premchand बचपन में बिछड़ गए दो जुड़वा भाइयों की कहानी, जो भिन्न परिस्थितियों में पले-बढ़े. क्या हुआ जब भेंट हुई? जानने के लिए पढ़िए : 

Judwan Bhai Munshi Premchand Ki Kahani

Judwan Bhai Munshi Premchand Ki Kahani

कभी-कभी मू्र्ख मर्द ज़रा-ज़रा-सी बात पर औरतों को पीटा करते हैं। एक गाँव में ऐसा ही एक किसान था। उसकी औरत से कोई छोटा- सा नुकसान भी हो जाता, तो वह उसे बग़ैर मारे न छोड़ता। एक दिन बछड़ा गाय का दूध पी गया। इस पर किसान इतना झल्लाया कि औरत को कई लातें जमाईं। बेचारी रोती हुई घर से भागी। उसे यह न मालूम था कि मैं कहाँ जा रही हूँ। वह किसी ऐसी जगह भाग जाना चाहती थी, जहां उसका शौहर उसे फिर न पा सके।

चलते-चलते वह जंगल में पहुँच गई। पहले तो वह बहुत डरी कि कोई जानवर न उठा जे जाये। मगर फिर सोचा, मुझे क्या डर जब दुनिया में मेरा कोई अपना नहीं है, तो मुझे जीकर क्या करना है। मरकर मुसीबत से तो छूट जाऊंगी। मगर उसे कोई जानवर न मिला और वह रात को एक पेड़ के नीचे सो गई। दूसरे दिन उसने उसी जंगल में एक छोटी-सी झोपड़ी बना ली और उसमें रहने लगी। लकड़ी और फूस की कोई कमी थी ही नहीं, मूंज भी इफ़रात से थी। दिन-भर में झोपड़ी तैयार हो गयी। अब वह जंगल में लकड़ियाँ बटोरती और उन्हें आस-पास के गाँवों में बेचकर खाने-पीने का सामान खरीद लाती। इसी तरह उसके दिन कटने लगे।

कुछ दिनों के बाद उस औरत के जुड़वा लड़के पैदा हुए। बच्चों को पालने-पोसने में उसका बहुत-सा वक्त निकल जाता और वह मुश्किल से लकड़ियाँ बटोर पाती। उसे अब रात को भी काम करना पड़ता। मगर इतनी मुसीबत झेलने पर भी वह अपने शौहर के घर न जाती थी।

एक-दिन वह दोनों बच्चों को लिये सो रही थी। गरमी की रात थी। उसने हवा के लिए झोपड़ी का दरवाजा खुला छोड़ दिया था। अचानक रोने की आवाज़ सुनकर उसकी नींद टूट गई, तो देखा कि एक बड़ा भारी भालू उसके एक बच्चे को उठाये लिये जा रहा है। उसके पीछे-पीछे दौड़ी, मगर भालू जंगल में न जाने कहाँ घुस गया। बेचारी छाती पीट-पीटकर रोने लगी।

थोड़ी देर में उसे दूसरे लड़के की याद आई। भागती हुई झोपड़ी में आई मगर देखा कि दूसरे लड़के का भी पता नहीं। फिर छाती पीटने लगी। …

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सुहाग की साड़ी मुंशी प्रेमचंद की कहानी

प्रस्तुत है – सुहाग की साड़ी मुंशी प्रेमचंद की कहानी (Suhag Ki Saree Munshi Premchand Ki Kahani) Suhag Ki Saree Short Story By Munshi Premchand विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के समय पत्नी की मनोस्थिति का वर्णन करती कहानी, जब उससे उसकी सुहाग की साड़ी वस्त्रों की होली जलाने के लिए मांगी जाती है.

Suhag Ki Saree Munshi Premchand Ki Kahani

Suhag Ki Saree Munshi Premchand Ki Kahani

(1)

यह कहना भूल है कि दांपत्य-सुख के लिए स्त्री-पुरुष के स्वभाव में मेल होना आवश्यक है। श्रीमती गौरा और श्रीमान् कुँवर रतनसिंह में कोई बात न मिलती थी। गौरा उदार थी, रतनसिंह कौड़ी-कौड़ी को दांतों से पकड़ते थे। वह हँसमुख थी, रतनसिंह चिंताशील थे। वह कुल-मर्यादा पर जान देती थी, रतनसिंह इसे आडम्बर समझते थे। उनके सामाजिक व्यवहार और विचार में भी घोर अंतर था। यहाँ उदारता की बाजी रतनसिंह के हाथ थी।

गौरा को सहभोज से आपत्ति थी, विधवा-विवाह से घृणा और अछूतों के प्रश्न से विरोध। रतनसिंह इन सभी व्यवस्थाओं के अनुमोदक थे। राजनीतिक विषयों में यह विभिन्नता और भी जटिल थी। गौरा वर्तमान स्थिति को अटल, अमर, अपरिहार्य समझती थी, इसलिए वह नरम-गरम, कांग्रेस, स्वराज्य, होमरूल सभी से विरक्त थी। कहती – ‘‘ये मुट्ठी भर पढ़े-लिखे आदमी क्या बना लेंगे, चने कहीं भाड़ फोड़ सकते हैं?’’

रतनसिंह पक्के आशावादी थे। राजनीतिक सभा की पहली पंक्तियों में बैठने वाले, कर्मक्षेत्र में सबसे पहले कदम उठाने वाले, स्वदेशव्रतधारी और बहिष्कार के पूरे अनुयायी। इतनी विषमताओं पर भी उनका दांपत्य-जीवन सुखमय था। कभी-कभी उनमें मतभेद अवश्य हो जाता था, पर वे समीर के वे झोंके थे, जो स्थिर जल को हल्की-हल्की लहरों से आभूषित कर देते हैं; वे प्रचंड झोंके नहीं, जिनसे सागर विप्लवक्षेत्र बन जाता है। थोड़ी-सी सदिच्छा सारी विषमताओं और मतभेदों का प्रतिकार कर देती थी।

(2)

विदेशी कपड़ों की होलियाँ जलायी जा रही थीं। स्वयंसेवकों के जत्थे भिखारियों की भांति द्वारों पर खड़े हो-हो कर विलायती कपड़ों की भिक्षा मांगते थे और ऐसा कदाचित् ही कोई द्वार था, जहाँ उन्हें निराश होना पड़ता हो। खद्दर और गाढ़े के दिन फिर गये थे। नयनसुख, नयनदुख, मलमल और तनजेब तनबेध हो गये थे। रतनसिंह ने आकर गौरा से कहा -“लाओ, अब सब विदेशी कपडे़ संदूक से निकाल दो, दे दूं।”

गौरा – “अरे तो इसी घड़ी कोई साइत निकली जाती है, फिर कभी दे देना।”

रतन – “वाह, लोग द्वार पर खड़े कोलाहल मचा रहे हैं और तुम कहती हो, फिर कभी दे देना।”

गौरा – “तो यह कुंजी लो, निकाल कर दे दो। मगर यह सब है …

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चतुर चित्रकार – Best Life Inspire Stories In Hindi

 नमस्कार दोस्तों आपका दिल से स्वागत हे तो आज हम एक चतुर चित्रकार की कहानी के बारे में बात करने वाले हे इस कहानी से आप ये सिख सकते हे की यदि हम संकट के वक्त चतुराई से काम करे तो हम संकट से बच सकते हे तो दोस्तों मुझे उम्मीद हे की आपको ये कहानी जरूर पसंद होगी।

life inspirational hindi story

चतुर चित्रकार की हिंदी कहानी 

रामपुर नामक एक छोटा सा गांव था उस गांव में मगन नामक एक चित्रकार रहता था जो तरह – तरह के प्राकृतिक दृश्यों का चित्र बनाता था उसे चित्र बनाने का बड़ा ही शौख था वो कई बार नदी , पहाड़ , बाग़ – बगीचे के भी चित्र बनाता था। Life Inspirational Hindi Story 

एक दिन की बात हे वो चित्रकार चित्र बनाने के लिए प्राकृतिक दृश्य की ख़ोज में एक घने जंगल में पहुँच जाता हे वहाँ उसे तरह – तरह के प्राकृतिक दृश्य देखने को मिलते हे जिसे देखने के बाद वो बहुत ही खुश हो जाता हे क्योकि कभी भी उसने ऐसे प्राकृतिक दृश्य नहीं देखे थे रंगबेरंगी फूल , झरने , रंगबेरंगी पक्षी , बड़े – बड़े पेड़ ये सब देखकर वो चित्रकार चित्र बनाने लगा। कुछ देर बाद वहां एक सेर आ गया सेर को देखकर चित्रकार के होश उड़ गए उसके पैर कापने लगे फिर भी उस चित्रकार ने हिम्मत की और उस सेर से कहने लगा की जंगल के राजा की जय हो में एक चित्रकार हु और में आपका चित्र बनाना चाहता हु कृपा करके आप सामने वाले पथ्थर पर बैठ जाइये में आपका बहुत ही सुन्दर चित्र बना दू। चित्र बनाने की बात सुनकर जंगल का राजा बहुत ही खुश हो गया और चित्रकार से बोला अगर चित्र अच्छा नहीं हुआ तो तुम्हारी खेर नहीं और वो चित्रकार के सामने बैठ गया चित्रकार ने चित्र बनाना शरू किया कुछ देर बाद चित्रकार सेर से बोला महाराज आपके अगले भाग का चित्र तो बन चूका हे लेकिन पिछले भाग का नहीं इसलिए आप मुँह उल्टा कर बैठ जाइये ताकि में आपको पिछले हिस्से का भी चित्र बना लू। 

अपने पुरे शरीर का चित्र बनवाने के लालच में शेर पीछे की और अपना मुँह करके बैठ गया तब चित्रकार अपना सारा सामान लेकर चुपके से वहाँ से रवाना हो गया। इस प्रकार उस चित्रकार में अपनी चतुराई की वजह से अपनी जान बचा ली। 

कहानी की सिख : जब हम किसी संकट में आ जाये तब हमें हिम्मत और …

चतुर चित्रकार – Best Life Inspire Stories In Hindi Read More