कहानी उस महिला किसान की जो आर्गेनिक खेती से लाखों कमा रही है!

Lalita Mukati Organic Farming in Madhya Pradesh

हमारे देश में जब किसान की बात आती है तो हम पुरुष के बारे में ही सोचते है और हमें महिलाओं का ध्यान नहीं आता है। दरअसल महिला किसान हमारे समाज में होती ही नहीं। वो पति के साथ खेतों में तो जाती है लेकिन किसान पति ही होता है। लेकिन कुछ महिलाएं होती है जो अपनी अलग पहचान बनाती है और ऐसा ही एक नाम है ललिता मुकाटी – Lalita Mukati का जो मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के बोड़लई में रहती है। ललिता आर्गेनिक तरीके से खेती – Organic Farming कर रही है और महीने के लाखो रुपये कमा रही है। ललिता को राज्य और केंद्र सरकार से कई सारे सम्मान भी मिल चुके है।

कहानी उस महिला किसान की जो आर्गेनिक खेती से लाखों कमा रही है – Lalita Mukati Organic Farming in Madhya Pradesh

ललिता ने अपनी कहानी बताते हुए कहा की “मेरे पति के पास लगभग 36 एकड़ की जमीन है और वो कृषि में स्तानक है। मैं उन्हें खेतो में काम करते हुए देखती थी तो खुद भी उनके साथ जाने लगी और काम करने लगी”।

ललिता ने कहा की शुरुआत में मेरे पति ही खेती करते थे लेकिन धीरे धीरे मैंने सारी तकनीक सीख ली और पूरा साथ देने लगी। इसके बाद मैंने देखा की खेती में केवल कीटनाशको का इस्तेमाल किया जाता है और यह पूरी तरह से गलत है।

यह मंहगे भी होते है और इनसे कोई उत्पाद सही भी नहीं मिलता है। ललिता ने यही से फैसला किया की वो अब कीटनाशको का इस्तेमाल नहीं करेगी। इसके बाद उन्होंने आर्गेनिक तरीके से खेती करने का विचार बनाया।

साल 2015 में आर्गेनिक खेती –

पचास साल की ललिता आज खेती से महीने के लगभग अस्सी हजार रुपये कमा रही है और इसकी शुरुआत उन्होंने साल 2015 में की थी। उन्होंने सभी कीटनाशको का इस्तेमाल करना बंद कर दिया और गोबर, गौमूत्र और रसोई से निकलने वाले कचरे का इस्तेमाल किया।

इसके बाद ललिता ने अपने खेतो में शीताफल, नीम्बू, केला और आंवला लगाना शुरू किया। इन्हें वो पूरी तरह से कीटनाशको से दूर रखती थी। शुरुआत में पैदावार कम हुई लेकिन कीटनाशको में पैसा नहीं लगाने से उन्हें फायदा होने लगा।

ललिता कहती है की पहले खाद और कीटनाशक में ही इतने पैसे लग जाते थे की केवल दो से तीन हजार का एक रबी में फायदा होता था। ललिता ने अपनी फसल को जब …

एक बंधुआ मजदूर का बेटा कभी ढोता था ईट पत्थर, आज है बीस कंपनियों का मालिक…

Mannem Madhusudana Rao

आपने अपने आसपास ऐसी कई सारी कहानिया सुनी होगी जो आपको प्रेरित करती होगी और ऐसे कई सारे लोग हुए है जिनसे हमे सीख मिलती है।

लेकिन उन्हें छोड़ बहुत सारे ऐसे लोग है जिनकी जिन्दगी चमत्कार लगती है। ऐसा लगता है जैसा की भगवान् ने साक्षात् इनके ऊपर कृपा की है। खाने की घर में अनाज नहीं था लेकिन कुछ सालो बाद करोडपति बन जाना ये चमत्कार से ज्यादा मेहनत और ईमानदारी पर निर्भर करता है और ऐसी ही कहानी है मधुसुदन राव की जो एक बंधुआ मजदूर के बेटे थे और खुद मजदूरी करते थे लेकिन आज बीस बड़ी बड़ी कम्पनियों के मालिक है।

एक बंधुआ मजदूर का बेटा कभी ढोता था ईट पत्थर, आज है बीस कंपनियों का मालिक – Mannem Madhusudana Rao

मधुसुदन राव का शुरुआती जीवन- Mannem Madhusudana Rao Biography

मधुसूदन राव का जन्म आँध्रप्रदेश के प्रकाशम जिले में हुआ। पिता का नाम पेरय्या और माँ का नाम रामुलम्मा है। घर में आठ भाई बहन और कमाने वाले माँ बाप, उनका काम था बंधुआ मजदूरी। माँ बीडी की फैक्ट्री में काम करती और बाप भी दिहाड़ी मजदूरी करते थे।

कन्दुकुरु तहसील का पलकुरु नाम का एक ऐसा गाँव जहाँ दलितों को सम्मान की नजरो से नहीं देखा जाता था। उन्हें घुटने के नीचे धोती नहीं पहनने दी जाती थी। मधुसुदन के माँ बाप सुबह जल्दी निकल जाते और देर रात घर आते लेकिन उसमे भी एक वक्त का खाना ही मिल पाता।

मधु हमेशा सोचते थे की आखिर उनके माँ बाप रोजाना कहा जाते है और इतना लेट क्यों आते है लेकिन जैसे जैसे वो बड़े हुए उन्हें समझ में आ गया की उनके माँ बाप एक बंधुआ मजदूर है। सपने तो मधु के भी बहुत बड़े थे लेकिन पेट की भूख के आगे सब धराशयी हो जाते थे।

घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं था लेकिन माँ बाप ने फैसला किया की वो घर में दो बेटों को पढ़ायेगे और इसमें मधु और उनके भाई का दाखिला स्कूल में करवाया गया। शुरुआती पढ़ाई गाँव के स्कूल में ही हुई। वो पढ़ते चले गए और पढाई में हमेशा अब्बल थे। दसवी और बारहवी तक की पढाई की और आगे के बारे में विचार करने लगे।

मधुसुदन राव की पढाई – Mannem Madhusudana Rao Education

मधु खुद बताते है की वो जब बारहवी करके निकले तो उन्हें बी.टेक करना था लेकिन उनके आसपास जुड़े हुए और टीचर्स का कहना था की वो पॉलिटेक्निक …

सोलापुर महाराष्ट्र की पूजा कौल का एक अनोखा स्टार्टअप…

Founder of OrganiKo Pooja Kaul

हम जीवन में गधों को कोई महत्व नहीं देते है और उस शख्स को गधे की संज्ञा दी जाती है जो कोई काम नहीं करता है। यानी की गधा हमारे लिए यूजलेस और नाकारा है लेकिन ये हमारे और आपके लिए हो सकता है, पूजा कौल के लिए नहीं।

पूजा कौल ने गधो का महत्व समझ और ये जाना की उनका दूध बहुत अधिक फायदेमंद होता है। उन्होंने इस क्षेत्र में जानकारी जुटाई और खोल दिया खुद का स्टार्टअप और उसे नाम दिया “आर्गेनिको”। ये स्टार्टअप गधे के दूध से ब्यूटी प्रोडक्ट बनाता है और बेचता है।

सोलापुर महाराष्ट्र की पूजा कौल का एक अनोखा स्टार्टअप – Founder of OrganiKo Pooja Kaul

ये अनोखा आईडिया आया पूजा कौल को, जो सोलापुर महाराष्ट्र राज्य के रहने वाली है। पूजा ने जब अपनी पढ़ाई पूरी की तो उसके बाद उन्हें घर में ही रहने का मन हुआ। इसके लिए उनके पास दो आप्शन थे की एक तो वो सरकारी नौकरी करे या फिर अपने सपनो की तरफ भागे।

पूजा ने खुद का बिजनस करने का विचार किया और इस क्षेत्र में रिसर्च किया। उन्हें पता चला की मिस्र की रानी बहुत सुंदर थी और इसकी वजह थी वो गधे के दूध का इस्तेमाल करती थी। यही से पूजा को आईडिया आया और उन्होंने अपने स्टार्टअप को नाम दे दिया “ओर्गैनिको”। इस स्टार्टअप का दावा है की वो शत-प्रतिशत शुद्ध चीजे बेच रहे है।

गधे की दूध के फ़ायदे – Donkey Milk Benefits

पूजा ने कहा की “उन्होंने जब रिसर्च किया तो पता चल की गधे के दूध में विटामिन सी, ए, बी और ओमेगा 3 जैसे महत्वपूर्ण तत्व होते है और ये सभी तत्व त्वचा को कोमल और सुंदर बनाने के लिए बहुत आवश्यक है। चेहरे पर आने वाले दागो को भी दूर करने में सहायक है।

कैसे होता है काम –

पूजा ने उन किसानो से संर्पक किया जो गधे का पालन करते थे और उनका दूध निकालते थे। इसकी कीमत लगभग तीन हजार रुपये प्रति लीटर होती है। पूजा ने किसानो से बात की और दो हजार रुपये लीटर के हिसाब से दूध खरीदना चालू किया और इसके बाद उससे ब्यूटी प्रोडक्ट बनाने की शुरुआत की।

पूजा इस दूध से तैयार किया गया साबुन, चारकोल और हनी सोप बेचती है। वह ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीको को आजमाती है और दोनों से लगभग उनके पास ग्राहक आते है। पूजा ने कहा की उनका टारगेट 25 …

इनफ़ोसिस जैसी कंपनी की नौकरी छोड़, इस लड़की ने खोला खुद का कंस्ट्रक्शन स्टार्टअप…

Priyanka Gupta Founder of Brick and Mortar Constructions

कंस्ट्रक्शन की दुनिया मतलब ठेकेदारी, हमने इस फील्ड के बारे में अभी तक यही जाना है। हमे लगता है की जिन्हें कोई काम नहीं आता वो ठेकेदार बन जाता है, लेकिन आपका सोचना तब गलत साबित हो जाएगा जब आप इनफ़ोसिस जैसी बड़ी कंपनी की नौकरी छोड़ कंस्ट्रक्शन में आई प्रियंका (Priyanka Gupta)की कहानी जान लेगे। भोपाल की रहने वाली प्रियंका की कहानी बड़ी गजब है। बड़ी कंपनी की नौकरी को छोड़कर उन्होंने खुद का कंस्ट्रक्शन स्टार्टअप खोला और नाम दिया “ब्रिक्स एंड मोर्टार”(Brick and Mortar)

इनफ़ोसिस जैसी कंपनी की नौकरी छोड़, इस लड़की ने खोला खुद का कंस्ट्रक्शन स्टार्टअप –
Priyanka Gupta Founder of Brick and Mortar Constructions

नहीं करना था एक ही काम-

प्रियंका गुप्ता भोपाल की रहने वाली है। पिता बिजनसमैन है और घर में पैसे की कोई ख़ास कमी नहीं है। बी.टेक करने के बाद प्रियंका ने जेविअर इंस्टिट्यूट भुवनेश्वर से एमबीए किया और इसके बाद उन्हें पहली नौकरी एचडीएफसी लाइफ में मिली। यहाँ एक साल उन्होंने काम किया और इस दौरान वो लगभग दस ब्रांच देखा करती थी।

इसके बाद प्रियंका ने इनफ़ोसिस में काम करना शुरू किया जहाँ उन्होंने परफॉरमेंस मैनेजमेंट सिस्टम को संभाला। प्रियंका के जीवन में सबकुछ सेट था, पैसे थे, लाइफ, बढिया जॉब लेकिन मन में एक कसक थी।

प्रियंका ने कहा की उन्हें लगता था की वो जिस फील्ड से पढ़कर आई है वो यहाँ कुछ काम नहीं आ रहा है। उन्होंने बदलाव करने का विचार किया। प्रियंका ने स्टार्टअप के बारे में सोचा। उन्हें लगा की इस क्षेत्र में जाने वाले लोग क्रिएटिव होते है और अपना जीवन भी बढिया जीते है।

लेकिन प्रियंका परंपरागत स्टार्टअप नहीं चुनना चाहती थी। उन्हें लगा की वेडिंग प्लानर, फोटोग्राफी और फ़ूड में जाने से कोई मतलब नहीं है और इसीलिए वो अलग करना चाहती थी। वो एक ऐसे फील्ड में काम करना चाहती थी जिससे इंसान को सीधे तौर पर फायदा हो और उन्हें आईडिया आया की अब कंस्ट्रक्शन में जाना है।

ऐसे मिला विचार-

प्रियंका ने कहा की मुझे लगता है की कंस्ट्रक्शन बहुत पैसे वाला फील्ड है लेकिन यहाँ पर सही से काम करने वालो की हमेशा से कमी रही है। कोई भी प्रोफेशनल इसमें आने का विचार नहीं करता है। अनपढ़ और अशिक्षित लोग सही से काम नहीं करते लेकिन उनसे बेहतर काम करवाया जा सकता है। उन्होंने खुद की कंपनी बनाई और नाम दिया “ब्रिक्स एंड …

व्हाट्सअप की सहायता से साड़ियाँ बेचकर ये महिला महीने के लाखों कमा लेती है – Whatsapp Saree Business Success Story

Whatsapp Saree Business Success Story

हम सब व्हाट्सअप जरूर इस्तेमाल करते है लेकिन सिर्फ मैसेज करने या फिर अपने ऑफिस के काम के लिए। हम ये भी जान ते है की अधिकतर लोग इसमें अपना समय बर्बाद करते है। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं की इसी अप्प का सही से इस्तेमाल कर आप करोड़ों काम सकते हैं।

जी हाँ एक महिला उद्यमी हैजिनका नाम है शनमुगा प्रिया जो चेन्नई की रहने वाली है। व्हाट्सअप की सहायता से साड़ियाँ बेचकर आज प्रिया करोडो कमाती है। बीते साल उनका टर्नओवर लगभग 2.4 करोड़रुपये रहा और आज अमेरिका और ब्रिटेन में उनकी साड़ियाँ सप्लाई होती है।

व्हाट्सअप की सहायता से साड़ियाँ बेचकर ये महिला महीने के लाखों कमा लेती है – Whatsapp Saree Business Success Story

प्रिया की सास भी साड़ियाँ बेचने का काम करती थी। वो घर घर जाकर साड़ियाँ बेचती और बाकी समय में घर का ध्यान रखती क्योकि प्रिया एक कंपनी में नौकरी कर रही थी। सास की मौत के बाद घर की जिम्मेदारी प्रिया के ऊपर आ गई और उन्होंने इसके लिए नौकरी छोड़ दी और घर में रहने लगी। अचानक उन्हें अपने सास के बिजनस को आगे ले जाने का आईडिया आया और उन्होंने ऐसा ही किया।

ऐसे की शुरुआत-

जब प्रिया ने इस काम को शुरू करने का विचार बनाया तो वो जहाँ भी जाती तो अपने साथ साड़ियों का थैला लेकर जाती। उस समय लोग उनके ऊपर हसते थे और उन्हें ये ना करने के लिए कहते थे लेकिन प्रिया नहीं मानी।

शुरुआत में उनके ग्राहक उनके रिश्तेदार, आस पड़ोस के लोग थे लेकिन बाद में काम बढने लगा। प्रिया ने इसकेलिए व्हाट्सअप का सहरा लेना शुरू किया। साल 2014 में उन्होंने एक ग्रुप की सहायतासे बीस साड़ियाँ बेचीं। इसके बाद खुद ही साड़ियाँ बनाने लग गई और इसके लिए कुछ लोगभी हायर कर लिए। प्रिया ने घर के छत पर एक गोदाम भी खोल लिया जिससे साड़ी देखने आनेकी चाहत रखने वाले लोग वहां आये और अपना सैंपल देख सके।

अब ये है बिक्री-

प्रिया ने एक के बाद एक अलग अलग व्हाट्सअप ग्रुप्स में अपनी साड़ियों का प्रमोशन जारी रखा। धीरे धीरे उनका व्यापार बढने लगा और पैसे भी आने लगे। साल 2016-17 में प्रिया ने कुल 2.4 करोड़ रुपये का कारोबार किया। वो कहती है की दिवाली और बाकी त्योहारों के समय में उनके पास अधिक आर्डर आते है।

वैसे वो दिन की पचास से अस्सी साड़ियाँ बेचती है लेकिन त्योहारों के …

माँ बनते ही कंपनी ने बाहर निकाला तो इस महिला ने खोल दी खुद की कंपनी

Anamika Sengupta founder of Almitra Sustainables

एक महिला के साथ बहुत सारी जिम्मेदारियाँ जुड़ी हुई होती है। वो एक पत्नी, माँ और बेटी होती है और वो कोशिश करती है की सभी रिश्ते अच्छे से निभा पायें। काम के साथ साथ अपने परिवार को संभालना उन्हें आता है। लेकिन क्या हो जब माँ बन जाने पर उन्हें काम से हाथ धोना पड़े।

एक औरत माँ बनती है तो उसे कंपनी छोड़कर जाने को कह दिया जाता है। इसके बाद भी वो हार नहीं मानती और खुद की कंपनी बना लेती है और उसे नाम देती है “अलमित्रा सस्टेनेबल”( Almitra sustainables)। ये कहानी है मुंबई की अनामिका सेनगुप्ता की जिनके माँ बनने पर कंपनी ने उन्हें कह दिया की अब आप काम में फोकस नहीं कर पाएगी और उन्हें निकाल दिया।

माँ बनते ही कंपनी ने बाहर निकाला तो इस महिला ने खोल दी खुद की कंपनी – Anamika Sengupta founder of Almitra Sustainables

मुंबई में एक छोटे से इलाके डोंबीबली में रहने वाली अनामिका की माँ हमेशा से यही चाहती थी की बेटी पढ़-लिखकर आगे बढ़े। छोटे से कमरे में पली बढ़ी अनामिका को उनकी माँ ने पढाई की अहमियत समझायी और उन्होंने अनामिका को खूब पढ़ाया।

रद्दीवाले से किताबे लेकर उन्हें पढना होता था क्योकि उनके पास किताब खरीदने के पैसे नहीं होते थे। इसके बाद कक्षा आठ में आते ही अनामिका ने खुद की लाइब्रेरी खोल ली और बच्चो को किताबे किराये में देने लगी।

अनामिका ने बढ़िया पढ़ाई की और ग्रेजुएशन के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई। अनामिका इस कंपनी में एचआर के तौर पर काम कर रही थी और तीस साल की उम्र होते होते उन्हें आठ साल का बहुत गहन अनुभव हो गया। तरक्की ऐसी हुई की कंपनी ने उन्हें ग्लोबल रिक्रूटमेंट हेड बना दिया और बढिया पैसे भी मिलने लगे।

इसी दौरान अनामिका को एक लड़के से प्यार हुआ और उन्होंने शादी करने का फैसला किया और अपना आगे का जीवन शुरू किया। शादी के बाद जब वो माँ बनी तो उनकी कंपनी के हाव भाव अनामिका के प्रति बदल गया। अनामिका को कंपनी से जाने के लिए कह दिया गया। इसके पीछे की वजह थी उनका माँ बनना। कंपनी ने कहा की अब आप काम में उतना ध्यान नहीं दे पाएगी और आख़िरकार अनामिका को काम छोड़ना पड़ा और वो घर में बच्चे की देखभाल करने लगी।

ऐसे आया आईडिया-

अपनी खुद की कंपनी खोलने का विचार उसी वजह से …

कहानी उस पैरालाईज इंसान की जिसने कोटा को “कोचिंग सिटी” बनाया!

Vinod Kumar Bansal

कोटा एक ऐसा शहर है जहाँ हर गली में आप सपने की उड़ान देख सकते है क्योकि हर साल दो लाख स्टूडेंट्स आइआइटी-मेडिकल के बड़े कालेजो में दाखिला पाने के लिए यहाँ आते है। आज कोटा को देश नहीं बल्कि दुनियाभर में जाना जाता है। पहले कोटा को औद्योगिक नगरी के नाम से जाना जाता था लेकिन एक शख्स के जूनून ने इसे कोचिंग सिटी यानी की शैक्षणिक नगरी बना दिया। वो शख्स चल नहीं सकता था लेकिन उसके सपने उड़ान लेते थे। नाम है वीके बंसल उर्फ़ विनोद कुमार बंसल – Vinod Kumar Bansal  जो की बंसल क्लासेस कोटा – Bansal Classes Kota के फाउंडर है।

कहानी उस पैरालाईज इंसान की जिसने कोटा को “कोचिंग सिटी” बनाया – Founder of Bansal Classes Kota  Vinod Kumar Bansal Biography

Vinod Kumar Bansal – विनोद बंसल का जन्म यूपी के झाँसी जिले में साल 1949 में हुआ। उनके पिता का नाम बीडी अग्रवाल और माता का नाम अंगूरी देवी था। पिता सरकारी नौकर थे लेकिन घर में पैसे अधिक नहीं थे। 1954 में पिता का ट्रान्सफर लखनऊ हो गया और वो भी यही आये और पढने लगे।

घर में लालटेन था तो पिता ने कहा की तुम टॉप करो तो घर में लाइट आ जाएगी बस इस बात ने जूनून डाल दिया और विनोद दिन-रात पढने लगे। कक्षा 6,7 और 8 लगातार टॉप करने के बाद उन्हें 372 रुपये की छात्रवृत्ति मिली जिससे लाइट भी लगी और टेबल फैन भी आया।

इसके बाद 12वीं अच्छे नम्बर आये तो बीएचयू में एडमिशन हो गया और फिर और फिर पहली नौकरी एक कंपनी में मिल गई कोटा में और वो कोटा आ गए।

बीमारी ने बनाया शिक्षक – Vinod Kumar Bansal Career

विनोद बंसल जब कोटा में एक केमिकल कंपनी में नौकरी कर रहे थे तब उन्हें शारीरिक समस्या होने लगी और उनके हाथ पांव कमजोर होने लगे। डॉक्टर से मिले तो उन्होंने कहा यह समस्या गंभीर है और आपका शरीर कुछ दिनों में काम करना बंद कर देगा अच्छा होगा आप कुछ और प्रोफेशन शुरू करे।

1983 में जब वो पूरी तरह से पैरालाइज हो गए तो डॉक्टर ने कहा की आप टीचिंग एट होम शुरू करो नहीं तो आप बोर हो जाओगे। बस तभी से कोटा में शुरू हुई बंसल क्लासेस और चल पड़ा आगे का सफ़र। शुरुआत में बिना किसी के नाम पढ़ा रहे थे लेकिन एक साल बाद इसे बंसल क्लासेस नाम दिया जो की आज दुनिया …

“टी ट्रेल्स” जहाँ सौ से अधिक तरह की चाय का स्वाद मिल सकता है!

Co-founders of Tea Trails Kavita Mathur

अगर चाय की बात की जाय तो कई सारे लोगो के कान खड़े हो जाते है और वो चाय पीने के लिए हर वक्त तैयार रहते है। हमारे देश में चाय केवल एक पेय नहीं है बल्कि ये जरिया है खुद के भावनाओं को बाहर निकलाने का और खुद को खोलने का।

अक्सर देखा जाता है की लोग चाय में चर्चा करते है, चाय से लोग कहा तक पहुच गए, खुद हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते है की वो पहले चाय बेचा करते थे। ऐसे ही एक महिला है जो चालीस के बाद रिटायर होने का विचार नहीं कर रही थी बल्कि दुनिया भर में घूमते हुए उसने ये ठान लिया था की भारतीयों के इमोशन से जुडी इस चीज को वो अलग स्वाद देगी।

उन्होनें ये कर दिखाया और देखते ही देखते आज बना दी है “टी ट्रेल्स” – Tea Trails जिसमे आपको सौ से अधिक तरह की चाय का स्वाद मिल सकता है। ये कहानी है कविता माथुर की।

“टी ट्रेल्स” जहाँ सौ से अधिक तरह की चाय का स्वाद मिल सकता है – Co-founders of Tea Trails Kavita Mathur

कविता दुनिया की सबसे बड़ी प्ले स्कूल यूरोकिड्स की संस्थापक सदस्यों में भी रह चुकी है। चालीस के बाद कविता ने देश विदेश में घूमना शुरू किया और कई तरह की चाय का आनंद लिया। कविता कहती है की मुझे एक बार एक जापानी चाय समारोह में आमंत्रण मिला और मैं वहां गई तो मुझे समझ आया की केवल टी बैग को डुबाकर उसमे चीनी मिला देना ही चाय नहीं है बल्कि चाय एक इमोशन है जो इस देश का हर नागरिक महसूस करता है।

इसके बाद उन्होंने ये ठान लिया की ये इमोशन वो वेस्ट नहीं होने देगी। वो कई जगह गई और महगी से महगी जगहों से लेकर सडक के किनारे वाली चाय का भी आनंद लिया।

55 साल की कविता शिक्षाविद रही है और उन्होंने कहा की रिटायर होने के बाद अपने पति उदय माथुर और उनके सहयोगी गणेश विश्वनाथन को समझ आया की चाय वाली जगहे आज के समय में युवाओ के लिए फेवरेट स्पॉट बने हुए है।

बस फिर क्या था सोच लिया की भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश जो सबसे अधिक चाय के बगान रखता है लेकिन उसकी चाय दूसरे देशो में चली जाती है तो अब इस देश को यहाँ का स्वाद मिलेगा। कविता मुंबई से है तो उन्होंने अपना पहला आउटलेट मुंबई के …

कहानी एक कुली के बेटे की जो आज करोड़ों रूपयें की कंपनी का मालक हैं!

Success Story of PC Mustafa

हमारे आसपास कितनी ही कहानियां घूमती है जो की अपने आप में अलग होती है और वो हमेशा ही अपने साथ एक बड़ा संघर्ष छुपाकर रखती है। ऐसी ही कहानी है पीसी मुस्तफा – PC Mustafa की जिहोने संघर्ष करते हुए सौ करोड़ की कंपनी बना दी।

कहानी एक कुली के बेटे की जो आज करोड़ों रूपयें की कंपनी का मालक हैं – PC Mustafa

बिजनेस का एक ऐसा आईडिया जो शायद किसी और के दिमाग में नहीं आया। इडली डोसा बनाने में होने वाले मेहनत को कम करके मुस्तफा ने मार्केट में रेडीमेड इटली डोसा लेकर आये और कंपनी को नाम दिया “आईडी फ्रेश फ़ूड”( iD Fresh Food)।

मुस्तफा का जन्म केरल के छोटे से गाँव वनयाड में हुआ और उनके पिता केवल चौथी कक्षा तक पढ़े थे और कॉफ़ी के बगीचों में माल ढोने काम करते थे। मुस्तफा का मन भी पढाई में नहीं लगता था इसीलिए इससे बचने के लिए वो पिता के साथ माल ढोने चले जाते थे।

छठवी के बाद वो पढना नहीं चाहते थे लेकिन जब ऐसा लगा की पिता जैसा जीवन ही जीना पड़ेगा तो खुद की राह बदल दी और फिर से छठवी कक्षा से आगे पढाई शुरू की और पास भी हुए। मुस्तफा जब स्कूल में थे तब उन्हें केवल मैथ्स समझ में आती थी और उनके टीचर उनसे कहते थे की तुम पिता की तरह काम करना चाहते या फिर अच्छी जिन्दगी जीना चाहते हो।

वही से मुस्तफा के मन में अच्छा जीवन जीने की कल्पना साकार हुई और उन्होंने पढ़ाई पूरी की और इंजीनियरिंग भी की और फिर एक कंपनी में नौकरी करने लगे। कंपनी में मुस्तफा ने बढिया काम किया और इस वजह से कंपनी ने उन्हें ब्रिटेन भेज दिया और इसके बाद दुबई लेकिन वो दुबई से वापिस आ गए। वहां से आकर वो एमबीए करने लगे और कुछ अलग ही तरीका देखने लग गये।

ऐसे आया बिजनेस का आईडिया –

जब मुस्तफा एमबीए की पढ़ाई कर रहे थे तब कभी कभार वो अपने भाई के दुकान में चले जाते थे। जिसमे इडली और डोसा बनाने के लिए घोल बेचने का काम था। कई सारी महिलाये वहां आती और घोल खरीद कर ले जाती। मुस्तफा खुद जानते थे की इस घोल से इडली बनाने में काफी समस्या होती है और यही से उन्हें आईडिया आया अपने बिजनेस का जिसने पैक्ड फूड्स की दुनिया में एक नई क्रांति को जन्म दिया।

2005

“थ्री इडियट्स” के जैसे तीन दोस्तों की कहानी – 3 Friends Story Like 3 Idiots Movie

3 Friends Story Like 3 Idiots Movie

हमारी जिन्दगी भी किसी फिल्म से कम नहीं होती है बल्कि यूं कहे की पूरी की जिन्दगी एक फिल्म होती है। ऐसी फिल्म जिसमे अंत में सब बेहतर होता है लेकिन शुरुआत बड़ी मुश्किल होती है। कई सारी जिन्दगिया होती है जिनकी कहानी देखने के बाद लगता है की ये फ़िल्मी स्टोरी है और ऐसी ही कहानी है तीन दोस्तों की जो की फिल्म थ्री इडियट्स से मिलती जुलती है।

जिस तरह से उसमे दोस्त सफल होकर मिलने का वादा करते है उसी तरह से इसमें भी तीन दोस्त सफल होकर मिलने का वादा करते है और निकल पड़ते है अपनी मंजिल की तरफ और दस साल बाद मिलते है अपने अपने जिन्दगी में सफलता लेकर।

“थ्री इडियट्स” के जैसे तीन दोस्तों की कहानी – 3 Friends Story Like 3 Idiots Movie

ये कहानी है आईएस निशांत जैन  (Nishant Jain) , लेखक सुमित अरोड़ा (Sumit Arora ) और कार्टूनिस्ट वतन सिंह (Vatan Singh) की। निशांत आज आईएस है और उन्होंने 13वीं रैंक हासिल की है, सुमित आज बॉलीवुड फिल्मो में राइटर है और वतन सिंह आज हिंदी के एक बड़े न्यूज़ चैनल में सीनियर कार्टूनिस्ट है।

मेरठ की गलियों से शुरुआत- तीनो दोस्त निशांत, वतन और सुमित मेरठ शहर के रहने वाले है। तीनो के जीवन में सबसे बड़ी कामन बात थी की इनके घर में कतई पैसे नहीं थे। बस गुजारा चल रहा था कैसे भी और फिर भी इनके सपने बहुत बड़े थे। शुरुआती पढ़ाई मेरठ के सरकारी स्कूल से हुई।

लेकिन कहते है ना की पूत के पाँव पालने में ही नजर आने लगते है और ऐसा था इनके साथ। सुमित और निशांत को लेखन का का शौक चढने लगा और वतन सिंह कार्टून बनाने में मजा लेते थे। सुमित को गद्य बहुत पसंद था तो निशांत को कविताये और वतन को व्य्वाग में बड़ी रूचि थी।

इनके घर में इतने पैसे नहीं थे की ये लोग जाकर अपने अपने फील्ड के बड़े इंस्टिट्यूट में दाखिला और अपना कैरियर बनाये। कई सारे छोटे मोटे काम करके खुद का खर्चा चलाने लगे। दसवी में तीनो फर्स्ट डिविसन उत्तीर्ण हुए और इसके बाद बारहवीं में भी अच्छे नम्बर लाये।

अब तक सुमित बढ़िया लिखने लगे थे और वतन सिंह के कार्टून भी लोकल अखबारों में प्रकाशित होने लगे थे तो वही निशांत देश की सेवा करने के लिए आईएस का ख्वाब अपने मन में संजोने लगे थे।

तीनो दोस्तों ने अलग अलग …