Urdu Mehfil Shayari – Parveen Shakir,Ibrahim Zauq,Jigar Moradabadi & Muneer Niyazi

ख्याल जिसका था मुझे ख्याल में मिला मुझे
सवाल का जवाब भी सवाल में मिला मुझे

BY Poetry – MUNEER NIYAZI

हम तो समझे थे की एक ज़ख़्म है भर जायेगा
क्या खबर थी की रग-ऐ -जान में उतर जायेगा

BY Poetry – Parveen Shakir

पास जब तक वो रहे दर्द थम जाता है
फ़ैल जाता है फिर आँख के काजल की तरह

BY Poetry – Parveen Shakir

तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे
न खुद की हो परवाह न खुदा याद रहे

BY Poetry – Ibrahim Zauq

हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझ पर
बाकि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जायेंगे

BY Poetry – Ibrahim Zauq

क्या जाने उसे वहां है क्या मेरी तरफ से
जो ख्वाब में भी रात को तनहा नहीं आता

BY Poetry – Ibrahim Zau

मेरी ज़िन्दगी तो गुज़री तेरे हिजर के सहारे
मेरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना

BY Poetry – Jigar Moradabadi

कुछ खटकता तो है पहलु में मेरे रह रह कर
अब खुदा जाने तेरी याद है या दिल मेरा

BY Poetry – Jigar Moradabadi…

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बशीर बद्र – उर्दू शायरी & ग़ज़ल

हमा वक़्त रंज-ओ-मलाल क्या , जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद कर के न दिल दुखा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

                  न गिला किया न खफा हुए , यूं ही रास्ते में जुदा हुए
                  न तू बेवफा न में बेवफा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

वो ग़ज़ल की एक किताब था , वो गुलाबों में एक गुलाब था
ज़रा देर का कोई ख्वाब था , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

                   मुझे पतझड़ों की कहानिया , न सुना सुना कर उदास कर
                   तू ख़िज़ाँ का फूल है मुस्कुरा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

वो उदास धूप समेट कर , कहीं वादियों में उतर चूका
उसे अब न दे मेरे दिल सदा ,जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

                  यह सफर भी कितना तवील है , यहाँ वक़्त कितना क़लील है
                 कहाँ लौट कर कोई आएगा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

वो वफ़ाएँ थी या जफायें थी , यह न सोच किस की खतायें थी
वो तेरे है उस को गले लगा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।

                  तुझे ऐतबार -ओ -यकीन नहीं , न ही दुनिया इतनी बुरी नहीं
                  न मलाल कर मेरे साथ आ , जो गुज़र गया सो गुज़र गया ।


Hama Waqt Ranj-O-Malaal Kya , Jo Guzaar Gaya So Guzar Gaya
Usay Yaad Kar Key Na Dil Dukha , Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

                    Na Gila Kiya Na Khafa Hue, Yoon Hi Raastey Mein Juda Hue
                    Na Tu Bewafa Na Mein Bewafa, Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

Wo Gazal Ki Ek Kitab Tha , Wo Gulabon Mein Ek Gulab Tha
Zara Der Ka Koi Khwaab Tha, Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

                    Mujhey Patjharon Ki Kahaniya , Na Suna Suna Kar Udaas Kar
                    Tu Kizaan Ka Phool Hai Muskura, Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

Wo Udaas Dhoop Samait Kar , Kahin Wadiyon Mein Utaar Chuka
Usay Ab Na Dey Mere Dil Sada,Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

                    Yeh Safaar Bhi Kitna Taweel Hai, Yahan Waqt Kitna Qaleel Hai
                   Kahan Laut Kat Koi Ayee Ga , Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

Wo Wafaein Thi Ya Jafaien Thi, Yeh Na Soch Kis Ki Khataien Thi
Wo Tere Hai Us Ko Gale Laga, Jo Guzaar Gya So Guzar Gaya

                  Tujhe Aitbar-O-Yakeen Nahin, Na Hi Duniya Itni Buri Nahi
                  Na Malaal Kar Mere Saath Aa , Jo Guzaar Gya So …

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Best Ever Shayari Colletion of Munir Niazi – मुनीर नियाज़ी शायरी मजमूआ

उसके जाने का रंज

मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गयी
पर मैं बुला रहा था जिसे , वो बेखबर रहा
उसकी आखिरी नज़र में अजब दर्द था “मुनीर”
उसके जाने का रंज मुझे उम्र भर रहा

Uske Jaane Ka Ranj

Meri Sada Hawa Mein Bohat Door Tak Gayi
Par Main Bula Raha Tha Jise, wo Bekhabar Raha
Uski Aakhiri Nazar Mein Ajab Dard Tha “Munir”
Uske Jaane Ka Ranj Mujhe Umar Bhar Raha


हम जवाब क्या देते

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे ग़लत थे, हम जवाब क्या देते
हवा की तरह मुसाफिर थे, दिलबरों के दिल
उन्हें बस एक ही घर का अजाब क्या देते

Hum Jawab Kya Dete

Kisi Ko Apnay Amal Ka Hisaab Kya Dete
Sawaal Saare Ghalat The, Hum Jawab Kya Dete
Hawa Ki Tarha Musafir The, Dilbaron Ke Dil
Unhain Bus Ak Hi Ghar Ka Azaab Kya Dete


ज़ुल्म मेरे नाम

शहर में वो मोअतबर मेरी गवाही से हुआ
फिर मुझे इस शहर में नमोअतबर उसी ने किया
शहर को बर्बाद करके रख दिया उस ने “मुनीर”
शहर पर यह ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया

Zulam Mere Naam

Shehar mein wo moatbir meri gawahi se huwa
Phir mujhe is shehar mein namoatbir usi ne kiya
Shehar ko barbaad kar kay rakh diya us ne “Munir”
Shehar par yeh zulam mere naam per usi ne kiya


ऐसे भी हम नहीं

ग़म से लिपट जाएंगे ऐसे भी हम नहीं
दुनिया से कट ही जाएंगे ऐसे भी हम नही
इतने सवाल दिल में हैं और वो खामोश देर
इस देर से हट जाएंगे ऐसे भी हम नहीं

Aise Bhi Hum Nahi

Gham say lipat jaingay Aise bhi hum nahi
Duniya say kat hi jaingay Aise b hum nahi
Itnay sawal dil mein hain or wo khamosh der
Is der say hat jaingay Aise bhi hum nahi


गम की बारिश

गम की बारिश ने भी तेरे नक़्श को धोया नहीं
तूने मुझ को खो दिया मैंने तुझे खोया नहीं
जानता हूँ एक ऐसे शख्स को मैं भी “मुनीर”
गम से पत्थर हो गया लेकिन कभी रोया नहीं

Gam Ki Barish

Gam ki barish ne bhi tere naqsh ko dhoya nahin
Tune mujh ko khoo diya mainne tujhe khoya nahin
Janata hoon Ek aise shaKhs ko main bhi “Munir”
Gam se patthar ho gaya lekin kabhi roya nahin


शहर-ऐ-संगदिल

इस शहर-ऐ-संगदिल को जला देना चाहिए
फिर इस की ख़ाक को भी उड़ा देना …

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ज़ख्म-ऐ जिगर

सज़ा

डूबी हैं मेरी उंगलियां खुद अपने ही लहू में ,
यह कांच के टुकड़ों को उठने की सज़ा है ..

Sazaa

Doobi hain meri ungliyaan khud apne hi lahuu main,
Yeh kaanch ke tukrron ko uthaney ki sazaa hai..


गुज़रे हुए वक़्त की यादें

सजा बन जाती है गुज़रे हुए वक़्त की यादें ,
न जाने क्यों छोड़ जाने के लिए मेहरबान होते हैं लोग …

Guzre Hue Waqt Ki Yaadein

Saza Ban Jati Hai Guzre Hue Waqt Ki Yaadein,
Najaane Kyun ChoOr Jaane K Liye Meharban Hote Hein LoOg…


तेरी एक निगाह

मेरे पास इतने सवाल थे मेरी उम्र में न सिमट सके
तेरे पास जितने जवाब थे तेरी एक निगाह में आ गए

Teri ek nigaah

Mere paas itnay sawaal thay meri umar se na simat sakay
Tere paas jitnay jawaab thay teri ek nigaah main aa gaye!!


ज़ख्म-ऐ जिगर

दर्द क्या होता है बताएंगे किसी रोज़
कमाल की ग़ज़ल है तुम को सुनाएंगे किसी रोज़

थी उन की जिद के मैं जाऊँ उन को मनाने
मुझ को यह बेहम था वो बुलाएंगे किसी रोज़

कभी भी मैंने तो सोचा भी नहीं था
वो इतना मेरे दिल को दुखाएंगे किसी रोज़

हर रोज़ शीशे से यही पूछता हूँ मैं
क्या रुख पे तबस्सुम सजाएंगे किसी रोज़

उड़ने दो इन परिंदों को आज़ाद फ़िज़ाओं में
तुम्हारे हों अगर तो लौट आएंगे किसी रोज़

अपने सितम को देख लेना खुद ही साक़ी तुम
ज़ख्म-ऐ -जिगर तुमको दिखायेगें किसी रोज़

Zakham-AE-Jigar

Dard Kya Hota Hai Batayein Gay Kisi Roz
Kamal Ki Ghazal Tum Ko Sunayein Gay Kisi Roz

Thi Un Ki Zid Ki Main Jaaoun Un Ko Manane
Mujh Ko Ye Veham Tha Wo Bulayein Gay Kisi Roz

Kabi Bhi Maine To Socha Bhi Nahi Tha
Wo Itna Mere Dil Ko Dukhayein Gay Kisi Roz

Har Roz Sheshay Se Yehi Poochta Hoon Main
Kya Rukh Pe Tabassum Sajayein Gay Kisi Roz

Urney Do In Parindon Ko Azaad Fizaon Mein
Tumhare Hon Agar To Lout Aayein Gay Kisi Roz

Apne Sitam Ko Dekh Lena Khud Hi Saqi Tum
Zakhm-AE-Jigar Tumko Dekhein Gay Kisi Roz…

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ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – मुनीर नियाज़ी

ज़िन्दगी की किताब

यह जो ज़िन्दगी की किताब है
यह किताब भी क्या किताब है
कहीं एक हसीं सा ख्वाब है
कहीं जान लेवा अज़ाब है

मुनीर नियाज़ी – ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – यह जो ज़िन्दगी की किताब है

Zindgi ki Kitab

Yeh jo Zindgi ki kitab hai
Yeh kitab bhi kya kitab hai
Kahin ek haseen sa khwab hai
Kahin jaan levaa azaab hai

Munir Niazi – Zindgi ki kitab Urdu Shayari – Yeh jo Zindgi ki kitab hai

रहमतों की हैं बारिशें

कभी खो दिया कभी पा लिया
कभी रो लिया कभी गा लिया
कहीं रहमतों की हैं बारिशें
कहीं तिशनगी बेहिसाब है

मुनीर नियाज़ी – ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – कभी खो दिया कभी पा लिया


Rehmaton ki Hain Barishain

Kbhi kho diya kbhi pa liya
Kabhi ro liya kbhi gaa liya
Kahin rehmaton ki hain barishain
Kahin tishnagi behisab hai

Munir Niazi – Zindgi ki kitab Urdu Shayari – Kbhi kho diya kbhi pa liya

वो क़यामतें जो गुज़र गयीं

कोई हद नहीं है कमाल की
कोई हद नहीं है जमाल की

वो ही क़ुर्ब-ओ-दौर की मंज़िलें
वो ही शाम खवाब-ओ-ख्याल की

न मुझे ही उसका पता कोई
न उसे खबर मेरे हाल की

यह जवाब मेरी सदा का है
के सदा है उसके सवाल की

वो क़यामतें जो गुज़र गयीं
थी अमानतें कई साल की

यह नमाज़-ऐ-असर का वक़्त है
यह घडी है दिन के ज्वाल की

है “मुनीर ” सुबह -ऐ -सफर नया
गयी बात शब् के मलाल की

मुनीर नियाज़ी – ज़िन्दगी की किताब उर्दू शायरी – वो क़यामतें जो गुज़र गयीं

Wo Qayamatein Jo Guzar Gayein

Koi had nahi hai kamaal ki
Koi had nahi hai jamaal ki

Wo hi qurb-O-daur ki manzilein
Wo hi sham khawab-O-khyaal ki

Na mujhe hi uska pata koi
Na use khabar mere haal ki

Yeh jawaab meri sada ka hai
Ke sada hai uske sawaal ki

Wo Qayamatein Jo Guzar Gayein
ThiN amanaten kayee saal ki

Yeh namaaz-AE-asar ka waqt hai
Yeh ghadi hai din ke zawaal ki

Hai “MONIR” subh-AE-safar naya
Gayee baat shab ke malaal ki

Munir Niazi – Zindgi ki kitab Urdu Shayari – Wo Qayamatein Jo Guzar Gayein

दिल की खलिश

ज़िंदा रहे तो क्या है जो मर जाएं हम तो क्या
दुनिया से ख़ामोशी से गुज़र जाएं हम तो क्या

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने
एक ख्वाब है जहां में बिखर जाएं हम तो क्या…

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जिंदगी की रंग-ओ-बू – Shayari of Life

मंजूर कब थी हमको वतन से दूरियां

आईना-ऐ-ख़ुलूस-ऐ-वफ़ा चूर हो गए
जितने चिराग-ऐ-नूर थे बे नूर हो गए
मालूम यह हुआ की वो रास्ते का साथ था
मंज़िल करीब आई और हम दूर हो गए
मंजूर कब थी हमको वतन से यह दूरियां
हालात की जफ़ाओं से मजबूर हो गए
कुछ आ गयी हमे एहले-ऐ-वफ़ा ऐ दोस्तों
कुछ वो भी अपने हुस्न पे मगरूर हो गए
चरागों की ऐसी इनायत हुई हफ़ीज़
के जो ज़ख़्म भर चले थे वो नासूर हो गए

Manzoor Kab Thi Humko Watan Se Dooriyan

Aaina-AE-Khuloos-E-Wafa Churr Ho Gaye
Jitne Chirag-AE-Noor The Benoor Ho Gaye
Malum Yeh Hua Ki Wo Raaste Ka Sath Tha
Manzil Kareeb Aayi aur Hum Door Ho Gaye,
Manzoor Kab Thi Humko Watan Se Yeh Dooriyan
Haalaat Ki Jafaoon Se Majboor Ho Gaye
Kuch Aa Gayi Hume Ahl-AE-Wafa Mein Ae dosto
Kuch Wo Bhi Apne Husn Pe Magroor Ho Gaye
Charagon Ki Aisi Inayaat Hui Hafeez
Ke Jo Zakham Bhar Chale the Wo Nasoor Ho Gaye


ऐ इंसान जरा संभल के चल

कल रात हम गुनगुनाते निकले दिल में कुछ अरमान थे
एक तरफ थे जंगल , एक तरफ श्मशान थे
रस्ते में एक हड्डी पैरो से टकराई , उस के यह बयान थे
ऐ इंसान जरा संभल के चल , वरना कभी हम भी इंसान थे

Ae insaan jara sambhal ke chal

Kal raat hum gungunate nikle dil mein kuch armaan the
Ek taraf thi jangal the, ek taraf shmshan the
Raste mein ek haddi paon se takrai, us ke ye bian the
Ae insaan jara sambhal ke chal, warna kabhi hum bhi insaan the


मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी क़ैद-ऐ-मुसलसल के सिवा कुछ भी नहीं
किया था जुर्म-ऐ-वफ़ा इस के सिवा कुछ भी नहीं
जीने की आरज़ू में रोज़ मर रहे हैं
दवा तेरी मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
खींचती है अपनी तरफ गुलशन की रंग-ओ-बू
ख्वाइश फूलों मैं खुशबू के सिवा कुछ भी नहीं
भूल जाना एक नय्मत है खुदा की इसलिए
भूलना तेरा हकीकत के सिवा कुछ भी नहीं
थोड़ा है फ़र्क़ बस इंसान और हैवान में
बाकि इस दुनिया में मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

Mohabbat ke siwa kuch bhi nahi

Zindagi qaid-ae-musalsal ke siwa kuch bhi nahi
Kiya tha jurm-ae-wafa iss ke siwa kuch bhi nahi
Jeenay ki arzo main roz mar rahey hain
Dawa teri mohabbat ke siwa kuch bhi nahi
Khinchti hai apni taraf gulshan ki rang-o-bu
Khwaish phoolon main …

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तेरे बदलने के बावसफ भी तुझ को चाहा है – परवीन शाकिर

यह एतराफ़ भी

तेरे बदलने के बावसफ भी तुझ को चाहा है
यह एतराफ़ भी शामिल मेरे गुनाहों में है …

Yeh Eytraaf bhi

Tere badalney k bawasf b tujh ko chaha hai
Yeh eytraaf bhi shamil mere gunnah mein hai…


तो हर बंदा खुदा होता

ज़रुरत तोड़ देती है ग़रूर-ओ-बेनीआजी को
न होती कोई मजबूरी तो हर बंदा खुदा होता .

 

To har banda khuda hota

zaroorat tod daiti hai gharoor-o-beniazi ko
na hoti koi majboori to har banda khuda hota.

Hindi and urdu shayari – Parveen Shakir ki Shayari – to har banda khuda hota

नया दर्द एक दिल में जगा कर चला गया

नया दर्द एक दिल में जगा कर चला गया
कल फिर वो मेरे शहर में आ कर चला गया

जिसे ढूंढती रही मैं लोगो की भीड़ में
मुझ से वो अपना आप छुपा कर चला गया

में उसकी खामोशी का सबब पूछती रही
वो किस्से इधर उधर के सुना कर चला गया

यह सोचती हूँ कैसे भूलूंगी अब उसे
एक शख्स वो जो मुझ को भुला कर चला गया

Naya dard ek dil mein jaga kar chala gya

Naya dard ek dil mein jaga kar chala gya
Kal phir wo mere sheher mein aa kar chala gya

jisay dhondti rahi main logo ke bheed mein
Mujh se wo apna aap chupa kar chala gya

Mein uski khamooshi ka sbab pochti rahi
Wo qisy idher udher ke suna kar chala gya

Yeh sochti hun kaisy bhuloongi ab usy
Aik shaks wo jo mujh ko bhula kar chala gya

 
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Yaqeen Hai Mujh ko Wo Laut Ayega

यक़ीन है मुझ को वो लौट आएगा

अभी तो इश्क़ मैं ऐसा भी हाल होना है
के अश्क़ रोकना तुम से मोहाल होना है

हर एक लब पर है मेरी वफ़ा के अफ़साने
तेरे सितम को अभी लाजबाब होना है

तुम्हें खबर ही नहीं तुम तो लूट जाओगे
तुम्हारे हिजर मैं इक लम्हा साल होना है

हमारी रूह पे जब भी अजब उतरें है
तुम्हारी याद को इस दिल की ढाल होना है

कभी तो रोयेगा वो भी किसी की बाहों मैं
कभी तो उस की हंसी को ज़वाल होना है

 

मिलेंगे हम को भी अपने नसीब की खुशियाँ
बस इंतज़ार है कब यह कमाल होना है

हर एक शख्स चलेगा हमारी राहों पर
मोहबत में हम ही वो मिसाल होना है

ज़माना जिस के ख़म -ओ -पेच में उलझा जाए
हमारी ज़ात को ऐसा सवाल होना है

यक़ीन है मुझ को वो लौट आएगा
उसे भी अपने किये का मलाल होना है

Yaqeen Hai Mujh ko Wo Laut Ayega

Abhi to ishq main aisa bhi haal hona hai
Ke ashq rokna tum se mohaal hona hai

Har aik lab pe hai meri wafa ke afsanay
Tere sitaam ko abhi lazawab hona hai

Tumhain khabar hi nahin tum to loot jao gay
Tumharay hijar main ik lamha sal hona hai

Humari rooh pe jaab bhi azaab utrain hai
Tumhari yaad ko is dil ki dhaal hona hai

Kabhi to royega wo bhi kisi ki bahoon main
Kabhi to us ki hansi ko zawal hona hai

Milaygi hum ko bhi apne naseeb ki khushiyaan
Bas intizaar hai kab yeah kamaal hona hai

Har aik shaks chalayga humari rahoon par
Mohabat main humahin wo misaal hona hai

Zamana jis ke kham-o-pech main uljha jaye
Humari zaat ko aisa sawal hona hai

Yaqeen hai mujh ko wo laut ayega
Usay bhi apne kiye ka malal hona hai…

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