मां का बटुआ: कुछ बातें बाद में ही समझ आती हैं

मैं अकेली बैठी धूप सेंक रही हूं. मां की कही बातें याद आ रही हैं. मां को अपने पास रहने के लिए ले कर आई थी. मां अकेली घर में रहती थीं. हमें उन की चिंता लगी रहती थी. पर मां अपना घर छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं चाहती थीं. एक बार जब वे ज्यादा बीमार पड़ीं तो मैं इलाज का बहाना बना कर उन्हें अपने घर ले आई. पर पूरे रास्ते मां हम से बोलती आईं, ‘हमें क्यों ले जा रही हो? क्या मैं अपनी जड़ से अलग हो कर तुम्हारे यहां चैन व सुकून से रह पाऊंगी? किसी पेड़ को अपनी जड़ से अलग होने पर पनपते देखा है. मैं अपने घर से अलग हो कर चैन से मर भी नहीं पाऊंगी.’ मैं उन्हें समझाती, ‘मां, तुम किस जमाने की बात कर रही हो. अब वो जमाना नहीं रहा. अब लड़की की शादी कहां से होती है, और वह अपने हसबैंड के साथ रहती कहां है. देश की तो बात ही छोड़ो, लोग अपनी जीविका के लिए विदेश जा कर रह रहे हैं. मां, कोई नहीं जानता कि कब, कहां, किस की मौत होगी. ‘घर में कोई नहीं है. तुम अकेले वहां रहती हो. हम लोग तुम्हारे लिए परेशान रहते हैं. यहां मेरे बच्चों के साथ आराम से रहोगी. बच्चों के साथ तुम्हारा मन लगेगा.’

कुछ दिनों तक तो मां ठीक से रहीं पर जैसे ही तबीयत ठीक हुई, घर जाने के लिए परेशान हो गईं. जब भी मैं उन के पास बैठती तो वे अपनी पुरानी सोच की बातें ले कर शुरू हो जातीं. हालांकि मैं अपनी तरफ से वे सारी सुखसुविधाएं देने की कोशिश करती जो मैं दे सकती थी पर उन का मन अपने घर में ही अटका रहता. आज फिर जैसे ही मैं उन के पास गई तो कहने लगीं, ‘सुनो सुनयना, मुझे घर ले चलो. मेरा मन यहां नहीं लगता. मेरा मन वहीं के लिए बेचैन रहता है. मेरी सारी यादें उसी घर से जुड़ी हैं. और देखो, मेरा संदूक भी वहीं है, जिस में मेरी काफी सारी चीजें रखी हैं. उन सब से मेरी यादें जुड़ी हैं. मेरी मां का (मेरी नानी के बारे में) मोतियों वाला बटुआ उसी में है. उस में तुम लोगों की छोटीछोटी बालियां और पायल, जो तुम्हारी नानी ने दी थीं, रखी हैं. तुम्हारे बाबूजी की दी हुई साड़ी, जो उन्होंने पहली तनख्वाह मिलने पर सब से छिपा कर दी थी, उसी संदूक में रखी है. …

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टेढ़ी दुम: अमित की फ्लर्ट की आदत को संगीता ने कैसे छुड़ाया?

कालेज के दिनों में मैं ज्यादातर 2 सहेलियों के बीच बैठा मिलता था. रूपसी रिया मेरे एक तरफ और सिंपल संगीता दूसरी तरफ होती. संगीता मुझे प्यार भरी नजरों से देखती रहती और मैं रिया को. रही रूपसी रिया की बात तो वह हर वक्त यह नोट करती रहती कि कालेज का कौन सा लड़का उसे आंखें फाड़ कर ललचाई नजरों से देख रहा है. कालेज की सब से सुंदर लड़की को पटाना आसान काम नहीं था, पर उस से भी ज्यादा मुश्किल था उसे अपने प्रेमजाल में फंसाए रखना. बिलकुल तेज रफ्तार से कार चलाने जैसा मामला था. सावधानी हटी दुर्घटना घटी. मतलब यह कि आप ने जरा सी लापरवाही बरती नहीं कि कोई दूसरा आप की रूपसी को ले उड़ेगा.

मैं ने रिया के प्रेमी का दर्जा पाने के लिए बहुत पापड़ बेले थे. उसे खिलानेपिलाने, घुमाने और मौकेबेमौके उपहार देने का खर्चा उतना ही हो जाता था जितना एक आम आदमी महीनेभर में अपने परिवार पर खर्च करता होगा. ‘‘रिया, देखो न सामने शोकेस में कितना सुंदर टौप लगा है. तुम पर यह बहुत फबेगा,’’ रिया को ललचाने के लिए मैं ऐसी आ बैल मुझे मार टाइप बातें करता तो मेरी पौकेट मनी का पहले हफ्ते में ही सफाया हो जाता.

मगर यह अपना स्पैशल स्टाइल था रिया को इंप्रैस करने का. यह बात जुदा है कि बाद में पापा से सचझूठ बोल कर रुपए निकलवाने पड़ते. मां की चमचागिरी करनी पड़ती. दोस्तों से उधार लेना आम बात होती. अगर संगीता ने मेरे पीछे पड़पड़ कर मुझे पढ़ने को मजबूर न किया होता तो मैं हर साल फेल होता. मैं पढ़ने में आनाकानी करता तो वह झगड़ा करने पर उतर आती. मेरे पापा से मेरी शिकायत करने से भी नहीं चूकती थी.…

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स्वीकृति: डिंपल की सोई ममता कैसे जाग उठी

आशीष के जाते ही डिंपल दरवाजा बंद कर रसोईघर की ओर भागी. जल्दी से टिफिन अपने बैग में रख शृंगार मेज के समक्ष तैयार होते हुए वह बड़बड़ाती जा रही थी, ‘आज फिर औफिस के लिए देर होगी. एक तो घर का काम, फिर नौकरी और सब से ऊपर वही बहस का मुद्दा…’ 5 वर्ष के गृहस्थ जीवन में पतिपत्नी के बीच पहली बार इतनी गंभीरता से मनमुटाव हुआ था. हर बार कोई न कोई पक्ष हथियार डाल देता था, पर इस बार बात ही कुछ ऐसी थी जिसे यों ही छोड़ना संभव न था.

‘उफ, आशीष, तुम फिर वही बात ले बैठे. मेरा निर्णय तो तुम जानते ही हो, मैं यह नहीं कर पाऊंगी,’ डिंपल आपे से बाहर हो, हाथ मेज पर पटकते हुए बोली थी. ‘अच्छाअच्छा, ठीक है, मैं तो यों ही कह रहा था,’ आखिर आशीष ने आत्मसमर्पण कर ही दिया. फिर कंधे उचकाते हुए बोला, ‘प्रिया मेरी बहन थी और बच्चे भी उसी के हैं, तो क्या उन्हें…’

बीच में ही बात काटती डिंपल बोल पड़ी, ‘मैं यह मानती हूं, पर हमें बच्चे चाहिए ही नहीं. मैं यह झंझट पालना ही नहीं चाहती. हमारी दिनचर्या में बच्चों के लिए वक्त ही कहां है? क्या तुम अपना वादा भूल गए कि मेरे कैरियर के लिए हमेशा साथ दोगे, बच्चे जरूरी नहीं?’ आखिरी शब्दों पर उस की आवाज धीमी पड़ गई थी. डिंपल जानती थी कि आशीष को बच्चों से बहुत लगाव है. जब वह कोई संतान न दे सकी तो उन दोनों ने एक बच्चा गोद लेने का निश्चय भी किया था, पर……

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मीनू: एक सच्ची कहानी

लेखक- मुकेश कुमार डेवट

बात उन दिनों की है, जब मैं मिलिटरी ट्रेनिंग के लिए 3 एमटीआर मडगांव, गोवा गया हुआ था. कुछ दिनों के लिए मिलिटरी अस्पताल, पणजी में मैं अपने पैरदर्द के इलाज के लिए रुका हुआ था.

एक दिन यों ही मैं अपने एक दोस्त साजन के साथ कंडोलिम बीच की तरफ घूमने निकला था. पहले हम मिलिटरी अस्पताल से बस ले कर फैरी टर्मिनल पहुंचे. फिर हम ने पंजिम का मांडोवी दरिया फैरी से पार किया. फिर वहां से हम दोनों कंडोलिम बीच के लिए बस में बैठ गए.

आप को बता दूं कि कंडोलिम बीच पंजिम से 13 किलोमीटर दूर है. साथ ही, यह भी बता दूं कि पणजी को ही आम बोलचाल में पंजिम कहा जाता है.

खैर, हम बस में सवार हो चुके थे. हम 3 सवारी वाली सीट पर बैठ गए थे. तीसरी सवारी कोई और थी. वह मर्द था.

मेरा दोस्त साजन शीशे की तरफ वाली सीट पर बैठ गया था. मैं बीच वाली सीट पर बैठ गया.

अचानक मेरी नजर हम से अगली सीट पर बैठी लड़की पर गई. उस पर सिर्फ एक ही सवारी बैठी थी. वह 18-19 साल की लड़की थी. उस का रंग सांवला था. उस के हाथ में गोवा मैडिकल कालेज और अस्पताल का कार्ड था. कार्ड पर उस का नाम मीनू लिखा हुआ था.

मैं ने अचानक ही पूछ लिया, ‘‘आप जीएमसी से आ रही हैं?’’

उस ने कहा, ‘‘हां.’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं भी इलाज के लिए जीएमसी में जाता रहता हूं.’’

मैं ने एकदम पूछ लिया, ‘‘आप को क्या हुआ है?’’

वह बोली, ‘‘छाती में दर्द है.’’

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धूर्त मेंढक, जैसी करनी वैसी भरनी As You Sow, So Shall You Reap

एक बार की बात है कि एक चूहे और मेंढक में गहरी दोस्ती थी| उन दोनों ने जीवन भर एक दूसरे से मित्रता निभाने का वादा किया लेकिन चूहा तो ज़मीन पर रहता था और मेंढक पानी में|

उन्होंने एक दूसरे के साथ रहने की एक तरकीब निकाली| दोनों ने एक रस्सी से खुद को बाँध लिया ताकि हर जगह हम एक साथ जाएँगे और सारे सुख दुख एक साथ भोगेंगे|

जब तक दोनों ज़मीन पर रहे, तब तक तो सब कुछ अच्छा चल रहा था| अचानक मेंढक को एक शरारत सूझी और उसने पास के ही एक तालाब में छलाँग लगा दी| बस फिर क्या था रस्सी से बँधे होने के कारण चूहा भी पानी में गिर गया|

अब चूहा बहुत परेशान था, वह डूब रहा था और बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था| लेकिन मेंढक धूर्त था उसने अपने मित्र चूहे को नज़रअंदाज़ करते हुए टरटरते हुए ज़ोर ज़ोर से तैरना शुरू कर दिया|

धूर्त मेंढक, जैसी करनी वैसी भरनी As You Sow, So Shall You Reap अब तो चूहे की जान ही निकल गयी वह बड़ी मुश्किल से मेंढक को तालाब के किनारे तक खींच कर लाया|

जैसे ही दोनों ने ज़मीन पर पैर रखा अचानक एक चील आई और चूहे को झपट कर उड़ने लगी अब रस्सी से बँधे होने के कारण मेढक भी पंजे में आ गया उसने छूटने का बहुत प्रयास किया लेकिन रस्सी को तोड़ ना सका और अंत में दोनों को चील ने खा लिया|

अब तो चूहे के साथ मेंढक भी बेमौत मारा गया|

इसीलिए कहा जाता है की जो लोग दूसरों का बुरा करते हैं उसके साथ वह भी गड्ढे में गिरते हैं, तो जैसी करनी वैसी भरनी|

आज के दौर में अक्सर ही लोग अपने फायदे के लिए दूसरों के साथ जुड़ जाते हैं और काम निकलने पर किनारा कर लेते हैं| ऐसे में वह अपने साथी के बारे में तनिक भी नहीं सोचते परन्तु आगे चलकर बुरा करने वाले व्यक्ति को उसका परिणाम भुगतना ही पड़ता है|…

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राजा और गमले की कहानी |ईमानदारी का फल |

बहुत ही समय पहले की बात है एक राजा था जो की बहुत ही ईमानदार था और अपनी सी ईमानदारी के लिए उसकी प्रजा उसको भगवान् मानती थी | लेकिन राजा अब बूढ़ा हो चूका था और उसको कोई संतान नहीं थी और वह यही सोचता था की कौन उसका उत्तराधिकारी बनेगा | समय बहुत तेजी से बदल रहा था और राजा ने सोच ही लिया की इस राज्य के ही किसी को उत्तराधिकारी बनाऊंगा | इसके लिए राजा ने अपने राज्य के सभी होनहार बच्चो को बुलाया और बोला मई आप लोगो को एक – एक बीज देता हूँ आप लोगो का यह बीज ले जाकर गमले में उगाना है और चार महीने बाद हम सब लोग फिर इकठा होंगे और उनमे से ही कोई राजा बनेगा |

सब बच्चे बहुत ही खुश थे और सब राजा बनाने के लिए ही कड़ी मेहनत करने लगे , उनमे से एक लड़का था जिसका नाम अनय था और वह अपनी माँ के साथ आया और घर पर गमले में बीज को लगा दिया और हर दिन उसकी सेवा करता | जब एक महीना बीत गया और अनय के गमले से कोई पौधा ही नही निकला तो वह परेशान होने लगा क्युकी उसके साथ वालो के गमले से तो पौधे बड़े होने लग थे | वह मन ही मन सोचने लगा हो सकता है मेरा बीज कुछ और टाइम लेगा उगने में और वह हर दिन उसकी सेवा करता था ,ऐसा ही करते – करते चार महीना पूरा होने को आ गया और बीज ऊगा ही नहीं , जो भी बच्चा उसका गमला देखता वह हसने लगता | अनय को भी बहुत ही शर्म आ रही थी की अब वह राजा को क्या बोलेगा \ उसने सोच ही लिया की वह राजा के पास नहीं जायेगा और बोल देगा की वह बहुत ही बीमार है | लेकिन उसकी माँ ने उसको खूब समझाया और बोला की तुमको जाना ही पड़ेगा | अपनी माँ के जिद के आगे उनकी एक भी नहीं चली और वह बीज का गमला लेकर चल दिया |

सब लोग उसके गमले को देख कर है रहे थे , सबका गमला हरा भरा था और बहुत ही सुन्दर था | अनय यह देख कर बहुत ही निराश हो गया और अपने गमले के साथ नीचे ही बैठ गया | थोड़ी ही देर में राजा भी आ गया और बोला सब लोग अपने गमले के साथ आये है न , …

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